दुमका में स्वास्थ्य सेवाएं ठप: आउटसोर्सिंग कर्मियों का अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार
दुमका । जिले के काठीकुंड में स्वास्थ्य व्यवस्था एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई है। 9 से 12 महीने तक बिना वेतन के काम करने वाले आउटसोर्सिंग स्वास्थ्य कर्मियों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया है। वेतन भुगतान में महीनों की देरी, पीएफ और ईएसआई में धांधली और न्यूनतम मजदूरी कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ने के विरोध में बुधवार से इन कर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है। प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित सूचना देकर अस्पताल परिसर में ही धरने पर बैठे इन कर्मियों के कड़े रुख से ग्रामीण इलाकों की चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह से चरमरा गई हैं।

आंदोलनकारी कर्मियों के निशाने पर बिरसा सिक्योरिटी एंड सर्विस सेटलमेंट जैसी आउटसोर्सिंग एजेंसियां हैं। कर्मियों का सीधा आरोप है कि सरकार से फंड जारी होने के बावजूद एजेंसियां जानबूझकर महीनों तक उनका पैसा दबाए रखती हैं। हद तो तब हो गई जब गरीब कर्मियों के मानदेय से जीएसटी के नाम पर 18 फीसदी की भारी-भरकम और गैर-कानूनी कटौती की जाने लगी। हालत यह है कि कागजों में एक जीएनएम का वेतन 33,415 रुपये दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत में उनके हाथ में मात्र 14,800 रुपये ही थमाए जाते हैं। एएनएम, लैब टेक्नीशियन, कंप्यूटर ऑपरेटर और सफाई कर्मियों के साथ भी इसी तरह का बड़ा आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
धरने पर बैठे इन आउटसोर्सिंग कर्मियों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, कोई भी काम पर नहीं लौटेगा। इनकी प्रमुख मांगों में पिछले 9 से 12 महीने के बकाया मानदेय का तुरंत एकमुश्त भुगतान, सभी कर्मियों का पीएफ और ईएसआई खाता खोलकर नियमित पर्ची देना और सालाना बोनस का भुगतान शामिल है।
इसके साथ ही, कर्मियों ने झारखंड सरकार के न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार भुगतान करने, हर महीने की 5 तारीख तक बैंक खाते में पैसे भेजने की गारंटी और 18 दिन का आकस्मिक अवकाश व महिला कर्मियों के लिए 180 दिन का मातृत्व अवकाश सम्मानपूर्वक देने की मांग उठाई है, जो उन्हें फिलहाल नहीं दिया जा रहा है।
इस बड़े आंदोलन का सीधा और सबसे दर्दनाक असर ग्रामीण तबके के गरीब मरीजों पर पड़ रहा है। लैब टेक्नीशियन, नर्सों, कोल्ड चेन हैंडलर और हाउसकीपिंग स्टाफ के एक साथ काम बंद कर देने से ओपीडी, टीकाकरण और पैथोलॉजी जांच जैसी अति-आवश्यक सेवाएं प्रभावित हो गई हैं। दूर-दराज से इलाज की आस में आ रहे मरीजों को बिना इलाज के ही मायूस होकर लौटना पड़ रहा है।
हड़ताली कर्मियों का कहना है कि उन्हें जनता की तकलीफ का पूरा अहसास है, लेकिन खाली पेट रहकर और अपने ही हकों का गला घोंटकर वे अब और काम नहीं कर सकते। हैरान करने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था के इस तरह ठप पड़ जाने के बावजूद, खबर लिखे जाने तक किसी भी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी या सिविल सर्जन कार्यालय की ओर से कर्मियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की गई है।
















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