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झारखंड: स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर! 108 एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल सातवें दिन भी जारी; वेतन और PF बकाए को लेकर आर-पार की जंग

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 रांची। झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। राज्य के गरीब मरीजों को अस्पतालों तक पहुंचाने वाली ‘108 आपातकालीन एंबुलेंस सेवा’ के कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल आज(मंगलवार) सातवें दिन भी जारी है। जुलाई महीने से वेतन का भुगतान न होने और पीएफ (PF) कटौती में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं को लेकर पूरे राज्य के लगभग 1500 से अधिक चालक और मेडिकल स्टाफ हड़ताल पर चले गए हैं। राजधानी रांची समेत सूबे के सभी 24 जिलों में एंबुलेंस के पहिये थमे रहने से ग्रामीण इलाकों में मरीजों और गर्भवती महिलाओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

वेतन और पीएफ घोटाले को लेकर आक्रोश

108 एंबुलेंस कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर चौबीसों घंटे सेवाएं देते हैं, लेकिन संचालन करने वाली निजी एजेंसी उनके हक का पैसा मार रही है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें जुलाई महीने से एक रुपये का भी वेतन नहीं दिया गया है, जिससे उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। इसके अलावा, उनके वेतन से हर महीने पीएफ की राशि तो काटी जाती है, लेकिन उसे ईपीएफओ के खाते में जमा नहीं किया जा रहा है। कर्मियों ने इस पूरे मामले में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका जताई है।

मरीजों की बढ़ी आफत, निजी गाड़ियां वसूल रहीं मनमाना किराया

एंबुलेंस सेवा ठप होने का सबसे बुरा असर सड़क दुर्घटनाओं के शिकार लोगों, नवजात शिशुओं और गंभीर मरीजों पर पड़ रहा है। सदर अस्पतालों और रिम्स  जैसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में मरीजों को लाने-ले जाने के लिए परिजनों को निजी एंबुलेंस या निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है। इस मजबूरी का फायदा उठाकर निजी वाहन चालक मरीजों से दो से तीन गुना तक मनमाना किराया वसूल रहे हैं, जिससे गरीब परिवारों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है।

मांगें पूरी न होने पर ‘पूर्ण चक्का जाम‘ की चेतावनी

कर्मचारी संघ ने दो टूक शब्दों में राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चेतावनी दी है कि जब तक उनके तीन महीने के बकाए वेतन का एकमुश्त भुगतान नहीं होता और पीएफ घोटाले की उच्च स्तरीय जांच शुरू नहीं की जाती, तब तक वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे। संघ ने साफ किया है कि यदि अगले 24 घंटों के भीतर सरकार ने कोई ठोस लिखित आश्वासन नहीं दिया, तो वे अपने आंदोलन को उग्र करते हुए ‘पूर्ण चक्का जाम’ करेंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की होगी। दूसरी तरफ, विभाग वैकल्पिक व्यवस्था के तहत सरकारी स्तर पर चालकों की व्यवस्था करने का प्रयास कर रहा है, जो अब तक नाकाफी साबित हुआ है।

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