आईविजन व्यूरों
मुंबई/नई दिल्ली। भारतीय कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार से इस समय एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी समूह, टाटा ग्रुप की पैरेंट (मुख्य) कंपनी टाटा संस को भारतीय रिजर्व बैंक से एक बड़ा झटका लगा है। टाटा संस ने आरबीआई के पास अपना नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी का लाइसेंस सरेंडर (वापस) करने की अर्जी लगाई थी, जिसे केंद्रीय बैंक ने साफ तौर पर खारिज कर दिया है।
आरबीआई ने न केवल इस अर्जी को नामंजूर किया, बल्कि टाटा संस को कड़ा निर्देश दिया है कि वे नियमों के मुताबिक अपनी कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने (IPO लाने) की प्रक्रिया को तुरंत शुरू करें। इस फैसले के बाद वित्तीय गलियारों और शेयर बाजार में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि अब टाटा संस को हर हाल में देश का सबसे बड़ा आईपीओ लेकर आना पड़ सकता है।
आखिर क्या है पूरा विवाद?
इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। आरबीआई ने कुछ साल पहले देश की वित्तीय व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए एक नियम बनाया था, जिसे ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ नियम कहा जाता है। इसके तहत देश की टॉप 15 बड़ी और महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को रखा गया। नियम कहता है कि जो भी कंपनी इस लिस्ट में आएगी, उसे नियम लागू होने के 3 साल के भीतर खुद को शेयर बाजार में लिस्ट कराना होगा।
टाटा संस को भी सितंबर 2023 में आरबीआई ने इसी ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ की सूची में डाला था। नियम के मुताबिक, टाटा संस को सितंबर 2025 या 2026 तक अपना आईपीओ लाना अनिवार्य था।
टाटा संस क्यों बचना चाहती थी आईपीओ से?
टाटा संस असल में टाटा समूह की एक ‘होल्डिंग कंपनी’ है, जो सीधे तौर पर जनता से पैसा जमा नहीं करती और न ही पारंपरिक तौर पर आम लोगों को लोन बांटती है। इसका मुख्य काम टाटा समूह की अन्य कंपनियों (जैसे टाटा मोटर्स, टीसीएस, टाटा स्टील) के शेयरों को संभालना और समूह का संचालन करना है।
टाटा संस के मालिकाना हक का करीब 66% हिस्सा टाटा ट्रस्ट्स के पास है। कंपनी बाजार में लिस्ट नहीं होना चाहती थी क्योंकि लिस्ट होने के बाद कंपनी को सेबी और बाजार के बेहद कड़े नियमों का पालन करना पड़ता। कंपनी के वित्तीय खातों और आंतरिक फैसलों की हर तिमाही सार्वजनिक समीक्षा होती। टाटा संस अपनी कूटनीतिक गोपनीयता बनाए रखना चाहती थी।
इसीलिए, नियमों से बचने के लिए टाटा संस ने अपने ऊपर से कर्ज का बोझ पूरी तरह खत्म कर लिया और आरबीआई से गुहार लगाई कि “चूंकि हम पर कोई कर्ज नहीं है और हम जनता से पैसा नहीं लेते, इसलिए हमारा एनबीएफसी लाइसेंस रद्द कर दिया जाए और हमें आईपीओ से छूट दी जाए।”
आरबीआई ने क्यों खारिज की अर्जी?
भारतीय रिजर्व बैंक अपने नियमों को लेकर बेहद सख्त रुख अपना रहा है। आरबीआई का मानना है कि टाटा संस भले ही सीधे जनता से जुड़ी न हो, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और टाटा समूह की कंपनियों पर इसका सीधा और बहुत बड़ा प्रभाव है।
आरबीआई ने स्पष्ट कर दिया कि नियम सभी बड़ी कंपनियों के लिए एक समान हैं और किसी भी एक कॉर्पोरेट घराने के लिए इसमें ढील नहीं दी जा सकती। लाइसेंस सरेंडर की अर्जी खारिज होने का सीधा मतलब है कि टाटा संस को एक एनबीएफसी के रूप में ही काम करना होगा और कानूनी तौर पर शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ेगा।
शेयर बाजार और निवेशकों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टाटा संस अपना आईपीओ बाजार में लाती है, तो यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ साबित हो सकता है। बाजार के अनुमानों के मुताबिक, टाटा संस की कुल वैल्यूएशन करीब 11 लाख करोड़ से 15 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकती है।
इस खबर के आते ही टाटा समूह की लिस्टेड कंपनियों (जैसे टाटा केमिकल्स, टाटा पावर, टाटा मोटर्स) के शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ गई है, क्योंकि इन कंपनियों के पास टाटा संस की हिस्सेदारी है, जिससे इनकी वैल्यू में भी भारी इजाफा होने की उम्मीद है।







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