विजयादशमी महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सनातन चेतना का वह शाश्वत दर्पण है जो हर साल हमें हमारे भीतर की रोशनी और अंधेरे से रू-ब-रू कराता है। पौराणिक काल में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लंकापति रावण का संहार किया, या आदिशक्ति मां दुर्गा ने महिषासुर का मर्दन किया, तो वह केवल दो शक्तियों का टकराव नहीं था। वह सत्य की असत्य पर, शील की उद्दंडता पर और समष्टि की व्यष्टि पर शाश्वत विजय का उद्घोष था। पौराणिक महत्व इस बात में निहित है कि जब-जब समाज में अनाचार चरम पर होगा, तब-तब न्याय की स्थापना के लिए दैवीय चेतना को जागृत होना ही होगा।
परंतु, आज इक्कीसवीं सदी के बदलते परिदृश्य में जब हम दशहरे के मेले और पटाखों के शोर के बीच खड़े होते हैं, तो एक गंभीर और मार्मिक सवाल अंतरात्मा को झकझोर देता है—क्या वाकई रावण मर रहा है? या फिर रावण ने अधिक चालाकी से हमारे ही भीतर शरण ले ली है?
आज का रावण अब दस सिरों वाला कोई सुदूर राक्षस नहीं है। वह हमारे समाज की रगों में छिपी हुई विकृतियां हैं। आज वह ‘नकली दवाओं के सिंडिकेट’ के रूप में मुस्कुराता है, जो चंद रुपयों के लालच में मासूम जिंदगियों को मौत के मुंह में धकेल देता है। वह ‘भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता’ के उस मलबे में छिपा है, जिसके नीचे दबकर जामुड़िया जैसे पावर प्लांटों में मज़दूर दम तोड़ देते हैं। वह सोशल मीडिया की उस ‘नफ़रत और मोब लिंचिंग’ में दहाड़ता है, जो त्योहारों के आपसी भाईचारे को पल भर में राख कर देती है।
आज विजयादशमी के मायने बदल चुके हैं। वर्तमान का यथार्थ यह मांग करता है कि हम कागज और बांस के रावण को जलाने की रस्म अदायगी से आगे बढ़ें। असली विजय तब होगी, जब हम अपने भीतर के लालच, समाज में फैली असुरक्षा और अपनों के प्रति संवेदनहीनता के रावण का दहन करेंगे।
आईविज़न के पाठकों के लिए आज का दिन केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का है। आइए, इस दशहरे पर लकड़ी के पुतलों को फूंकने के साथ ही अपने भीतर के अहंकार रुपी रावण का ङी दहन करें। साथ ही अपने अंतरमन में सोई हुई न्याय और मर्यादा की उस ‘राम-चेतना’ को पुनर्जीवित करें, जिसकी आज इस टूटते हुए समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है। जय राम जी की
















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