आईविजन व्यूरो
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आगामी अक्टूबर माह में नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट-पुलट कर रख दिया है। इस चुनावी समर की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली सुगबुगाहट यह है कि कांग्रेस ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। राजनीति के गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि आखिर केंद्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ गठबंधन की दुहाई देने वाली कांग्रेस ने बंगाल की धरती पर ममता का हाथ थामने से इनकार क्यों कर दिया?
इस राजनीतिक अलगाव के पीछे कोई तात्कालिक नाराजगी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक मजबूरी और तृणमूल कांग्रेस का गहराता आंतरिक संकट है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने के बाद, टीएमसी अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी अंदरूनी जंग लड़ रही है। पार्टी के भीतर मचे घमासान और बागी गुट के उभार ने ममता बनर्जी की राजनीतिक साख को गंभीर चोट पहुंचाई है। यहां तक कि पार्टी के नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिसका मामला निर्वाचन आयोग के पास लंबित है। ऐसे नाजुक दौर में कांग्रेस के प्रांतीय और केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि सांगठनिक रूप से बिखराव की कगार पर खड़ी टीएमसी के साथ जाना आत्मघाती हो सकता है। कांग्रेस अब टीएमसी को सहयोग के बजाय एक राजनीतिक ‘बोझ’ के रूप में देख रही है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस का अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की तड़प है। बंगाल की राजनीति में दशकों तक एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों से शून्य पर सिमट चुकी थी। टीएमसी ने हमेशा कांग्रेस के पारंपरिक मतों में सेंध लगाकर खुद को मजबूत किया है। ऐसे में, यदि कांग्रेस इस उपचुनाव में भी ममता बनर्जी के साथ गठबंधन करती, तो वह राज्य में अपनी स्वतंत्र पहचान को हमेशा के लिए दफन कर देती। नंदीग्राम और रेजिनगर जैसी सीटों पर अकेले उतरकर कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह राज्य में भाजपा और टीएमसी के बीच एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में खुद को पुनर्जीवित करने के लिए तैयार है।
हालांकि, इस फैसले के राष्ट्रीय निहितार्थों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। विपक्षी एकजुटता का जो ताना-बाना राष्ट्रीय स्तर पर बुना जाता रहा है, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और जमीनी हकीकतों के आगे वह अक्सर तार-तार होता दिखता है। दिल्ली से लेकर बंगाल तक, क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपनी मजबूरियां हैं और कांग्रेस की अपनी राष्ट्रीय आकांक्षाएं।
संक्षेप में कहा जाए तो, बंगाल उपचुनाव में कांग्रेस का यह ‘एकला चलो रे’ का नारा एक बड़ा राजनीतिक जुआ है। यह फैसला यह तय करेगा कि क्या कांग्रेस बंगाल की जमीन पर दोबारा अपनी जड़ें जमा पाएगी, या फिर उसका यह आक्रामक कदम भाजपा विरोधी वोटों के बिखराव का कारण बनकर विपक्षी राजनीति को एक नया नुकसान पहुंचाएगा। फिलहाल, कांग्रेस ने टीएमसी के ‘डूबते जहाज’ की सवारी न करने का जो साहसिक फैसला लिया है, उसने बंगाल की चुनावी जंग को बेहद त्रिकोणीय और दिलचस्प बना दिया है।








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