नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने कैंसर की जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों में मुनाफे के नाम पर चल रही भारी लूट पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फार्मास्युटिकल कंपनियों और रिटेलर्स के गठजोड़ पर तल्ख टिप्पणी करते हुए इसे “दिनदहाड़े डकैती” करार दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को इस गंभीर वित्तीय शोषण को रोकने के लिए तुरंत नीतिगत और दंडात्मक कदम उठाने का आदेश दिया है।
₹2,700 की दवा और ₹27,000 की MRP का खेल
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए गए। कोर्ट को बताया गया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई आवश्यक दवाएं, जो थोक डीलरों या रिटेलर्स को महज ₹2,700 में उपलब्ध होती हैं, उन पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹27,000 तक छापा जा रहा है। यानी मरीजों से लागत से 900% से अधिक की कीमत वसूली जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा, “यह मुनाफाखोरी नहीं, बल्कि लाचार मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती है। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा परिवार पहले से ही मानसिक तनाव में होता है, और दवाओं की यह कृत्रिम महंगाई उन्हें कर्ज के दलदल में धकेल देती है।”
अदालत का केंद्र सरकार को सख्त निर्देश
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। कोर्ट ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे केवल चुनिंदा दवाओं पर नहीं, बल्कि कैंसर की सभी आवश्यक दवाओं की कीमतों पर कैपिंग (मूल्य सीमा) तय करें। पीठ ने सरकार से पूछा कि इस तरह की बेलगाम को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और अगली सुनवाई तक इस पर विस्तृत कार्ययोजना रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद उम्मीद है कि सरकार ‘ड्रग्स प्राइज कंट्रोल ऑर्डर’ के तहत दवाओं के व्यापार मार्जिन को सीमित करने के लिए सख्त गाइडलाइंस जारी करेगी। यदि ऐसा होता है, तो देश के लाखों कैंसर मरीजों को हर महीने हजारों रुपये की सीधी राहत मिल सकेगी।














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