धर्मेंद्र कुमार
तेज रफ्तार अक्सर जानलेवा होती है—चाहे वह जिंदगी की अंधी दौड़ हो या फिर सड़कों पर दौड़ते लोहे के भारी-भरकम वाहन। गंतव्य पर चंद मिनट पहले पहुंचने की यह आत्मघाती ललक इंसान को उस सफर पर भेज देती है, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। जमशेदपुर के दोमुहानी मरीन ड्राइव पर गुरुवार (24 सितंबर 2026) तड़के हुआ भीषण सड़क हादसा इसका सबसे ताजा और दिल दहला देने वाला उदाहरण है। एक अनियंत्रित तेज रफ्तार कार ने सड़क किनारे खड़े एक खराब (ब्रेकडाउन) ट्रक को पीछे से इतनी जोरदार टक्कर मारी कि कार के परखच्चे उड़ गए और उसमें सवार चार होनहार युवाओं की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। मृतकों में राज्य की कैबिनेट मंत्री की बेटी भी शामिल हैं। लेकिन यह न तो पहली घटना है और न ही आखिरी। विडंबना देखिए कि चीखों और मलबे से पटी सड़कों को देखने के बाद भी न तो यहां का तंत्र जागने को तैयार है और न ही आम अवाम।
विश्व मानचित्र पर अपनी सुनियोजित टाउनशिप और औद्योगिक अनुशासन के लिए विख्यात जमशेदपुर की पहचान अब धीरे-धीरे ‘सड़क हादसों के शहर’ के रूप में तब्दील हो रही है। देश के आधिकारिक आंकड़ों और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की वार्षिक रिपोर्टों पर नजर डालें, तो चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आता है। जमशेदपुर जैसे छोटे शहर में प्रति लाख आबादी पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और मौतों की दर, कोलकाता और मुंबई जैसे विशाल महानगरों की तुलना में काफी अधिक है। जहां करोड़ों की आबादी और लाखों वाहनों के दबाव वाले मुंबई-कोलकाता जैसे महानगरों में यातायात प्रबंधन को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए पुलिस प्रशासन आधुनिकतम तकनीकों और मुस्तैदी के साथ सड़कों पर 24 घंटे तैनात रहता है, वहीं जमशेदपुर की स्थिति इसके बिल्कुल उलट है।
इस व्यवस्थागत विफलता के पीछे पूरा सिस्टम और यहां की जनता की सामूहिक लापरवाही जिम्मेदार है। जमशेदपुर ट्रैफिक पुलिस की प्राथमिकताएं आज पूरी तरह से भटक चुकी हैं। यातायात व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों (ब्लैक स्पॉट्स) की निगरानी करने के बजाय, पूरी पुलिस मशीनरी को हेलमेट चेकिंग और चालान काटने के जरिए राजस्व वसूली के अंतहीन अभियान में झोंक दिया गया है। जब पुलिस का मुख्य ध्येय जीवन की सुरक्षा के बजाय सरकारी खजाने या जेबों को भरना हो जाए, तो सड़कों पर अराजकता का फैलना निश्चित है।
हादसों की यह विभीषिका रात ढलते ही अपने चरम पर पहुंच जाती है। जैसे ही शहर में नो-इंट्री की समयसीमा समाप्त होती है, अंदरूनी सड़कों पर भारी मालवाहक ट्रकों और ट्रेलरों का एकछत्र, खूनी राज कायम हो जाता है। गंतव्य तक पहुंचने और ज्यादा से ज्यादा ट्रिप लगाने की अंधी होड़ में ये भारी वाहन तमाम यातायात नियमों, स्पीड लिमिट और मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर सड़कों पर यमदूत बनकर दौड़ते हैं। दोमुहानी की घटना भी इसी प्रशासनिक ढुलमुलपन का नतीजा है, जहां एक खराब भारी वाहन बिना किसी रिफ्लेक्टर या सुरक्षा संकेतक के रात भर बीच सड़क पर खड़ा रहा और अंततः चार हंसते-खेलते परिवारों के चिराग बुझ गए।
यह लेख किसी राजनीतिक दल या अधिकारी विशेष की आलोचना मात्र नहीं है, बल्कि उस तंत्र को आईना दिखाने का प्रयास है जो अपनी प्राथमिकताओं को भूल चुका है। यदि अब भी जमशेदपुर प्रशासन ने राजस्व वसूली की सनक से बाहर निकलकर मरीन ड्राइव और हाईवे पर सख्त स्पीड मॉनिटरिंग, नो-इंट्री के दौरान कड़े नियमों का पालन और भारी वाहनों के चालकों की काउंसिलिंग सुनिश्चित नहीं की, तो विकास की चमचमाती सड़कें इसी तरह मासूमों के खून से लाल होती रहेंगी। समय की मांग है कि हम जागें, इससे पहले कि रफ्तार का यह दानव किसी और घर की खुशियां लील जाए।















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