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नई दिल्ली। ‘भारत मंडपम’ में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का आगाज़ केवल भारत की कूटनीतिक मेजबानी का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को साधने का एक ऐतिहासिक अवसर है। आज जब दुनिया आर्थिक विखंडन और युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, तब भारत इस विस्तारित 11 सदस्यीय संगठन की कमान संभालकर वैश्विक व्यवस्था में खुद को एक ‘बैलेंसिंग पावर’ (संतुलनकारी महाशक्ति) के रूप में स्थापित कर रहा है। इस शिखर सम्मेलन के मंच से भारत मुख्य रूप से चार बड़े मोर्चों पर सीधे लाभ हासिल करने की ओर अग्रसर है।
आर्थिक और व्यापारिक लाभ: भारतीय निर्यात और MSMEs को नई उड़ान
भारत के लिए ब्रिक्स देशों का बाजार एक सोने की खदान की तरह है। वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों को भारत का माल निर्यात करीब 82 अरब डॉलर का रहा है, जबकि सेवा निर्यात 31.3 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इस सम्मेलन के जरिए भारत अपने फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयों), इंजीनियरिंग सामानों और डिजिटल सेवाओं के लिए टैक्स और नियमों की अड़चनों को कम कराने की मजबूत पैरवी कर रहा है। यदि भारत अन्य सदस्य देशों से कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने और टेस्टिंग मानकों को साझा मान्यता दिलाने में सफल रहता है, तो देश के लघु और मध्यम उद्योगों (MSMEs) के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के दरवाजे सीधे खुल जाएंगे।
लोकल करेंसी में ट्रेड और फिनटेक का डंका: ‘यूपीआई‘ (UPI) की वैश्विक धाक
इस समिट में भारत का सबसे बड़ा वित्तीय एजेंडा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स (सीमा पार भुगतान) और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना है। भारत अपने अत्याधुनिक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) यानी यूपीआई (UPI) मॉडल को ब्रिक्स देशों के बीच एक साझा वित्तीय नेटवर्क के रूप में पेश कर रहा है। यदि ब्रिक्स देश आपसी व्यापार के लिए भारत की भुगतान प्रणालियों को जोड़ते हैं, तो भारतीय रुपये की वैश्विक साख मजबूत होगी, अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी और भारतीय व्यापारियों का विदेशी ट्रांजैक्शन खर्च बेहद कम हो जाएगा।
चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ पिघलने का मौका
भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए यह समिट एक मजबूत कूटनीतिक ढाल है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 7 साल के लंबे अंतराल के बाद भारत आए हैं। सीमा विवाद (गलवान घाटी के बाद) के कारण दोनों देशों के बीच बने तनाव को दूर करने के लिए ब्रिक्स एक ऐसा ‘गैर-टकराव वाला’ मंच प्रदान करता है, जहां भारत अपनी संप्रभुता से समझौता किए बिना चीन के साथ व्यापारिक और राजनयिक सामान्यीकरण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह मंच भारत को पश्चिमी देशों के गुट (जैसे अमेरिका समर्थित संगठन) और पूर्वी शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीतिक स्वायत्तता देता है।
‘ग्लोबल साउथ‘ के निर्विवाद नेता के रूप में उदय
इस समिट में नए सदस्यों (मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया) के शामिल होने के बाद ब्रिक्स की ताकत और बढ़ गई है। भारत इस विस्तारित मंच पर अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और एशियाई देशों (Global South) की आवाज का नेतृत्व कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN), आईएमएफ (IMF) और वर्ल्ड बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग को तेज करके भारत खुद को दुनिया के विकासशील देशों के एकमात्र भरोसेमंद वकील के रूप में स्थापित कर रहा है, जिससे भविष्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा और मजबूत होगा।
‘भारत मंडपम’ में तय होने वाली कूटनीति केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित नहीं रहेगी। यह समिट भारत को ऊर्जा सुरक्षा (रूस-ईरान से तेल-गैस आयात), क्रिटिकल मिनरल्स (सप्लाई चेन) और डिजिटल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी। भारत के लिए यह समय कूटनीतिक गुटबाजी का हिस्सा बनने का नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के अपने मूल मंत्र के साथ एक ऐसे ‘तीसरे ध्रुव’ (Third Pole) का नेतृत्व करने का है, जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था का रिमोट कंट्रोल नई दिल्ली के हाथों में हो।











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