तेल आयात पर 100% टैरिफ के प्रस्ताव पर आमने-सामने आए भाजपा और विपक्ष
आईविजन व्यूरो
नई दिल्ली: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए एक नए विधेयक ने भारत के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस में ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक वोटिंग में 214-211 से मंजूरी मिल गई है। इस संशोधित विधेयक के तहत, रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100% तक दंडात्मक व्यापार शुल्क लगाने का प्रावधान शामिल किया गया है, जिसमें भारत का नाम प्रमुखता से दर्ज है। इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बाद भारत की विदेश नीति और कूटनीति को लेकर देश के भीतर राजनीतिक जंग छिड़ गई है।
कूटनीतिक विफलता या देशहित? विपक्ष के तीखे सवाल
इस अमेरिकी कदम के सामने आते ही विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की “सफल वैश्विक कूटनीति” के दावों पर कड़ा प्रहार किया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित पूरे गठबंधन ने सरकार को घेरते हुए सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति अमेरिकी प्रशासन को यह समझाने में विफल रही है कि भारत अपनी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल पर निर्भर है। विपक्षी नेताओं का यह भी कहना है कि यदि अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 100% टैरिफ लगा दिया, तो भारत का कपड़ा, फार्मा और आईटी जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को भारी नुकसान होगा। इससे देश में आर्थिक संकट और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
भाजपा का पलटवार
वहीं दूसरी ओर, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अमेरिकी दबाव को सिरे से खारिज करते हुए इसे भारत की संप्रभु विदेश नीति का हिस्सा बताया है। भाजपा का कहना है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पूर्व में भी दोहराया है कि भारत के ऊर्जा स्रोत के फैसले देश के नागरिकों के आर्थिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लिए जाते हैं, न कि किसी बाहरी देश के दबाव में। सरकार का तर्क है कि भारत वर्तमान में अपनी जरूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से आधा हिस्सा अकेले रूस से आता है। ऐसे में सस्ते तेल का आयात रोकना देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के साथ अन्याय होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति के पास होंगे विशेषाधिकार
रक्षा और व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होने के अंतिम चरण में है, लेकिन 100% टैरिफ भारत पर अपने-आप लागू नहीं होगा। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देश-विशिष्ट रियायतें देने या प्रतिबंधों को लागू करने के लिए व्यापक विशेषाधिकार देता है। यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर इस विधेयक पर रोक लगाने के लिए दबाव बना पाएगा।
भारत के आर्थिक थिंक-टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, यह विधेयक असल में द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में भारत पर एकतरफा शर्तें थोपने और दबाव बनाने का एक अमेरिकी कूटनीतिक जरिया मात्र है। भारत आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन के साथ बातचीत कर कूटनीतिक स्तर पर इन प्रावधानों से छूट पाने के लिए प्रयास तेज करेगा।











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