मुंबई। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी ने भारतीय वित्तीय बाजार की कमर तोड़ दी है। मंगलवार (29 सितंबर 2026) को घरेलू शेयर बाजार जहां चौतरफा बिकवाली के कारण छह महीने के निचले स्तर के करीब आ गए हैं, वहीं विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार निकासी के चलते अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी ऐतिहासिक रूप से कमजोर होकर दो महीने के निचले स्तर 96/USD के पार चला गया है।
शेयर बाजार में कोहराम: 6 महीने के निचले स्तर पर बेंचमार्क इंडेक्स
मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में अमेरिका-ईरान गतिरोध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते निवेशकों में भारी डर का माहौल है। आज शुरुआती कारोबार में ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 500 अंक से अधिक टूटकर 72,250 के स्तर पर आ गया। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 150 अंकों की गिरावट के साथ 22,600 के नीचे ट्रेड करता दिखा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक मोर्चे पर तनाव कम नहीं हुआ, तो यह गिरावट भारतीय शेयर बाजार में लगातार आठवें हफ्ते भी जारी रह सकती है। आज के कारोबार में सबसे ज्यादा मार ऑटो, मेटल, रियल्टी और मीडिया सेक्टर्स के शेयरों पर पड़ी है।
क्रूड ऑयल का झटका और रिकॉर्ड गिरावट पर रुपया
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) की कीमत बढ़कर 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से देश का आयात बिल बढ़ने की चिंताएं गहरी हो गई हैं।
इस चौतरफा दबाव के कारण फॉरेक्स मार्केट में रुपया आज शुरुआती कारोबार में ही 16 पैसे कमजोर होकर 96.14 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसल गया। हालांकि, बाजार में ऐसी चर्चाएं हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्थिति को संभालने के लिए डॉलर की बिकवाली कर हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है, लेकिन डॉलर इंडेक्स की मजबूती और क्रूड के बढ़ते दाम घरेलू मुद्रा पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं।
निवेशकों के डूबे खरबों रुपये
इस भारी बिकवाली और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा भारतीय बाजारों से पूंजी निकालने के कारण दलाल स्ट्रीट (D-Street) पर निवेशकों के खरबों रुपये स्वाहा हो गए हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाने की आशंका और घरेलू स्तर पर उच्च मूल्यांकन भी बाजार को ऊपर उठने से रोक रहे हैं। आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक, जब तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती, तब तक बाजारों में यह भारी उतार-चढ़ाव और अस्थिरता जारी रहेगी।






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