नईदिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर अब किसी भी तरह के धरने, प्रदर्शन या आंदोलन की गूंज सुनाई नहीं देगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के बाद, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को ‘नामित विरोध स्थल’ की सूची से पूरी तरह हटा (Denotify) दिया है। इस बड़े प्रशासनिक फैसले के बाद दिल्ली की सियासत में भूचाल आ गया है और आज (13 अक्टूबर) इस आदेश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है।
क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे देशव्यापी आंदोलन और विभिन्न संगठनों के हिंसक प्रदर्शनों के कारण कनॉट प्लेस और लुटियंस दिल्ली के इस संवेदनशील वीवीआईपी (VVIP) इलाके की सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा हो गया था। समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि जंतर-मंतर पर लगातार होने वाले जमावड़े से स्थानीय निवासियों को भारी परेशानी होती है, व्यापारिक गतिविधियों को नुकसान पहुंचता है और लुटियंस जोन की कानून-व्यवस्था बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी आधार पर पुलिस ने यहां किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है।
लोकतंत्र की आवाज दबाने का आरोप, विपक्ष और सामाजिक संगठन लामबंद
दिल्ली पुलिस के इस फैसले पर विपक्षी दलों और विभिन्न नागरिक समाज संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जंतर-मंतर दशकों से आम जनता, किसानों, छात्रों और न्याय की मांग करने वाले देश के नागरिकों की आवाज का मुख्य केंद्र रहा है। इसे धरना स्थल की सूची से हटाना सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकार और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने की आजादी को कुचलने जैसा है।
आज दिल्ली हाई कोर्ट पर टिकीं सबकी नजरें
इस विवादित फैसले को चुनौती देते हुए नागरिक अधिकार संगठनों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में पुलिस के इस आदेश को असंवैधानिक बताते हुए इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। आज होने वाली इस सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि अदालत का यह फैसला भविष्य में राजधानी में होने वाले आंदोलनों और नागरिक अधिकारों की दिशा तय करेगा।
















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