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चाकुलिया:आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव: फीकी होती जा रही है संथाल समाज के पारंपरिक दासाई नृत्य की चमक

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दासाई नृत्य में महिलाएं शामिल नहीं होती हैं।, सिर्फ पुरुष ही करते हैं दासाई नृत्य।

 

 लौकी से बने‌‌ विशेष प्रकार के वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है।, इक्के दुक्के गांवों में हो रहा है दासाई नृत्य।

चाकुलिया(संवाददाता)। आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से दशहरा के मौके पर होने वाले संथाल (आदिवासी) समाज के पारंपरिक दासाई नृत्य की चमक धीरे-धीरे फीकी होती जा रही है। यह नृत्य संथाल समाज की एक बेहद समृद्ध और ऐतिहासिक धरोहर है। यह केवल एक नृत्य ही नहीं, बल्कि संथालों के गौरवशाली इतिहास, संघर्ष और उनके गुरुओं की यादों को समेटे हुए एक पवित्र नृत्य है। मगर आज इसके अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।

आज से 15 – 20 साल पहले एक वक्त था जब संथाल बहुल गांवों में दशहरा के कई दिन पूर्व से ही इस नृत्य की धूम मच जाती थी। गांव से लेकर राज्य की राजधानी रांची और देश की राजधानी दिल्ली तक इस नृत्य की धूम मचती थी। मगर आज स्थिति यह है कि महज इक्के दुक्के गांवों में ही यह नृत्य होते नजर आ रहा है। अब पहले के जैसा इस नृत्य को लेकर उत्साह नहीं है। आज की युवा पीढ़ी इससे विमुख हो रही है। बावजूद इसके आज भी कई गांवों में संथाल युवा इस नृत्य को कर रहे हैं, और अपनी इस समृद्ध परंपरा को जीवंत रखने की कोशिश कर रहे हैं। चाकुलिया प्रखंड के कई कई गांवों में षष्ठी के दिन से इस नृत्य का आयोजन संथाल बहुल गांवों में दशहरा से पहले पांच दिनों तक होता है। इस नृत्य के लिए पुरुष ही महिला बनते हैं। इस नृत्य में महिलाएं शामिल नहीं होती हैं। यह कला उनकी समृद्ध संस्कृति का एक प्रमुख भाग हैं। दासाई नृत्य में भाग लेने वाले पुरुष महिलाओं का रूप धारण करते हैं। सिर पर बंधी पगड़ी में मोर पंख लगाते हैं। इस नृत्य में लौकी से बने वाद्य यंत्र जिसे भुआंग के नाम से जाना जाता है, का प्रयोग होता है।

दासाई नृत्य की टोली नृत्य करते हुए घर घर जाती है। महिलाएं इन्हें धान और चावल देती हैं। सिर पर मोर पंख बांधे संथाल समाज के पुरुष जब पैरों में घुंघरू बांध कर भुआंग, केंदरी, घंटी, थाली बजाते हुए नृत्य करते हैं और गाते हैं तो हर कोई मोहित हो जाता है। क्योंकि गीत से बड़ी ही दिलकश आवाज निकलती है। ‌ चाकुलिया के संथाली लेखक सह संपादक मोहन चंद्र बास्के कहते हैं कि इस नृत्य का जन्म संथाल समाज के क्रांतिकारियों को खोजने के लिए हुआ था। जब बाहरी आक्रमणकारियों ने आदिवासी समुदाय के क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया। संथाल समाज की वीरांगना आयनम और काजल का अपहरण असुरों ने कर लिया गया था। तब उन्हें खोजने के लिए दसाई नृत्य का सहारा लिया गया था। आदिवासी पुरुष महिला रूप धारण कर नृत्य करते हुए अलग-अलग टोलियों में निकलते थे। वाद्य यंत्र भुआंग में तीर धनुष और अन्य पारंपरिक हथियार छिपा कर रखते थे।‌ ताकि दुश्मनों को इसकी जानकारी नहीं हो। दासाई नृत्य हाय रे हाय‌ से शुरू होता है। यह दुख का प्रतीक है। संथाल समाज के क्रांतिकारियों को बंदी बनाने का दुख इस नृत्य और गीत में झलकता है। गीत में देहेल –  देहेल शब्द का प्रयोग होता।‌  यह विजय का प्रतीक है और गीत और नृत्य का तालमेल करता है। दासाई नृत्य में मां दुर्गा का जिक्र भी आता है। उन्होंने कहा कि दासाई एक महीने का नाम भी है। इसी माह में इस नृत्य का आयोजन विजयादशमी के पूर्व पांच दिनों के लिए किया जाता है।

दासाई नृत्य संथाल समाज का एक ऐतिहासिक और पारंपरिक नृत्य है। ‌यह नृत्य संथाल समाज की समृद्ध संस्कृति का एक प्रमुख अंग है। युवा पीढ़ी अब इससे विमुख हो रही है।‌ इस नृत्य को जीवंत रखने के लिए संथाल समाज के युवा वर्ग आगे आए, मोहन चंद्र बास्के, संथाली लेखक सह संपादक।

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