JHAHIN/2014/58773

पुलिस को है इसका इंतजार, क्या जयराम को मिल रहा है बीजेपी का समर्थन

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धर्मेन्द्र कुमार

झारखंड की सियासत में डुमरी विधायक जयराम महतो और झारखंड पुलिस एसोसिएशन के बीच उपजा विवाद महज़ एक वायरल ऑडियो या कथित बदसलूकी का मामला नहीं रह गया है। इस घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा, कानून के इकबाल और राजनीतिक नफे-नुकसान के गणित को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। धनबाद के बरवाअड्डा थाना प्रभारी रवि कुमार और विधायक के बीच की तीखी नोकझोंक का जो ऑडियो सामने आया है, उसने राज्य की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक शुचिता पर गंभीर सवाल दाग दिए हैं। सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न यह है कि जब मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो चुकी है, पुलिस एसोसिएशन लगातार कार्रवाई की मांग करते हुए राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दे रहा है, तो फिर पुलिस को आखिरकार कार्रवाई करने के लिए किसके आदेश का इंतजार है? इस पूरे प्रकरण में सत्ता पक्ष (झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन) की खामोशी और तटस्थता सबसे अधिक विचलित करने वाली है। एक ओर वर्दी का सम्मान दांव पर लगा है, तो दूसरी ओर जनता द्वारा चुने गए एक माननीय की हठधर्मिता है। सरकार का इस संवेदनशील गतिरोध को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम न उठाना उसकी प्रशासनिक विफलता और नीतिगत असमंजस को उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार इस मामले में सीधे हस्तक्षेप से कतरा रही है, क्योंकि विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किसी भी तरह की जल्दबाजी बड़े वोट बैंक को नाराज कर सकती है। यही कारण है कि समाज और सियासत आज दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है। जयराम महतो के समर्थक इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जंग और अपनी जाति व क्षेत्र की आवाज को दबाने की साजिश बता रहे हैं, जबकि कानून के पैरोकारों का स्पष्ट मानना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि का ऐसा आचरण पूरी तरह असंवैधानिक और अराजक है। इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक पहलू वह वायरल ऑडियो है, जिसमें जयराम महतो कथित तौर पर “सरकार बदलने पर बदला लेने” की बात कह रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसके कई मायने निकाल रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों में वर्ष 2029 तक जयराम महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) की अपने दम पर सरकार बनने की संभावना व्यावहारिक रूप से काफी कम नजर आती है। ऐसे में ‘बदला लेने’ के इस दांव का सीधा संकेत भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पाले की ओर जाता दिख रहा है। तथ्य भी इस ओर इशारा करते हैं कि इस पूरे विवाद के बीच बीजेपी के वरिष्ठ नेता और प्रतिपक्ष के चेहरे [जयराम महतो] के प्रति काफी संयमित और कहीं न कहीं सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाए हुए हैं। बीजेपी नेताओं का यह कहना कि “यदि पुलिस बोल सकती है, तो विधायक को भी अपनी बात रखने का हक है”, इस बात की तस्दीक करता है कि जयराम महतो को बीजेपी का मौन और परोक्ष समर्थन हासिल है। बीजेपी भली-भांति जानती है कि जयराम महतो ने पिछले चुनावों में उनके और उनकी सहयोगी पार्टी आजसू के पारंपरिक ‘कुड़मी-महतो’ वोट बैंक में बड़ी सेंध को पूरी तरह अलग-थलग करने के बजाय उन्हें अपने पाले में लाना या उनके सहारे झामुमो विरोधी वोटों को एकजुट रखना बीजेपी के लिए एक दूरगामी और फायदे का सौदा साबित हो सकता है। लड़ाई अब व्यक्तिगत अहंकार से आगे बढ़कर ‘सिस्टम बनाम राजनीति’ की बन चुकी है। यदि पुलिस अपनी ही एफआईआर पर कार्रवाई करने में हिचकिचाती है, तो इससे कानून का इकबाल कमजोर होगा। वहीं, यदि राजनेता लोकतांत्रिक सीमाओं को लांघकर वर्दी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाएंगे, तो प्रशासनिक तंत्र का मनोबल टूटेगा। सरकार को अपनी रहस्यमयी चुप्पी तोड़नी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून किसी भी राजनीतिक रसूख या भविष्य के चुनावी समीकरणों का बंधक न बने।

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