JHAHIN/2014/58773

लाल आतंक के ‘आकाश’ का अंत

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2.20 करोड़ के इनामी माओवादी असीम मंडल ने टेके घुटने, झारखंड-बंगाल में नक्सलवाद का ‘द एंड

आईविजन व्यूरो रिपोर्ट


रांची/कोलकाता। पूर्वी भारत के जंगलों में चार दशकों से आतंक और समानांतर सरकार चलाने का दंभ भरने वाले लाल गलियारे को आज सबसे बड़ा झटका लगा है। सुरक्षा एजेंसियों और झारखंड-पश्चिम बंगाल पुलिस के संयुक्त ऑपरेशनों से चारों तरफ से घिरे, प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के शीर्ष रणनीतिकार और सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश उर्फ तिमिर उर्फ मनोज उर्फ दीपक ने आखिरकार अपने हथियार डाल दिए हैं।

असीम मंडल पर झारखंड सरकार की ओर से 1 करोड़ रुपये और ओडिशा सरकार की ओर से 1.20 करोड़ रुपये का संयुक्त रूप से 2.20 करोड़ रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित था। खुफिया इनपुट्स के अनुसार, झारखंड के सारंडा, कोल्हान और पारसनाथ के जंगलों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन नवजीवन’ और ‘फॉवर्ड कैंप रणनीति’ के कारण असीम मंडल पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका था। वह अपनी जान बचाकर पश्चिम बंगाल भागा था, जहां गुरुवार (17 सितंबर) को उसने कोलकाता एसटीएफ (STF) के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

यह आत्मसमर्पण केवल एक नक्सली का आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत में माओवादी विचारधारा और उनके सैन्य तंत्र के पूरी तरह ध्वस्त होने का आधिकारिक दस्तावेज़ है।

आत्मसमर्पण की इनसाइड स्टोरी

झारखंड पुलिस मुख्यालय और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, असीम मंडल पिछले तीन महीनों से सुरक्षा बलों के रडार पर था। कोल्हान और सारंडा के जंगलों में सीआरपीएफ (CRPF), कोबरा (CoBRA) बटालियन और झारखंड पुलिस ने मिलकर इतने अग्रिम सुरक्षा शिविर बना दिए थे कि नक्सलियों का रसद नेटवर्क पूरी तरह कट गया।

दस्ते का बिखराव और अकेले पड़ने की कहानी

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा में असीम मंडल के मुख्य दस्ते  के तीन सबसे भरोसेमंद और खूंखार सहयोगियों राम प्रसाद मार्डी, मीता उर्फ नयनतारा और गौरी ने आत्मसमर्पण कर दिया था। अपने सबसे घातक हथियारों और रणनीतिकारों के जाने के बाद असीम मंडल जंगल में अकेला पड़ गया था। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, वह पिछले 15 दिनों से गंभीर रूप से बीमार भी चल रहा था और सुरक्षा बलों की भारी घेराबंदी के कारण उसे चिकित्सा सहायता नहीं मिल पा रही था। झारखंड में कोई सुरक्षित ठिकाना न देख वह चुपके से सीमा पार कर पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर इलाके में दाखिल हुआ, जहां उसने स्थानीय पुलिस और एसटीएफ के माध्यम से आत्मसमर्पण की इच्छा जताई।

कौन है असीम मंडल उर्फ आकाश?

मूल रूप से पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना थाना क्षेत्र के अंतर्गत उत्तर फुलचुक गांव का रहने वाला असीम मंडल कभी मेधावी छात्र हुआ करता था। असीम मंडल 1980 के दशक में अपने कॉलेज के दिनों के दौरान कट्टर वामपंथी विचारधारा के संपर्क में आया था। तत्कालीन छात्र राजनीति से शुरू हुआ उसका सफर धीरे-धीरे भूमिगत उग्रवाद में तब्दील हो गया। साल 2011 में पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाके में माओवादियों के सबसे खूंखार और चर्चित राष्ट्रीय नेता मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद बंगाल में माओवादी संगठन अनाथ हो गया था। उस दौर में असीम मंडल उर्फ आकाश को संगठन ने आगे बढ़ाया और उसे पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड सीमा (त्रि-सीमा क्षेत्र) के सैन्य संचालन की कमान सौंपी गई। उसकी क्रूर रणनीतियों और संगठन के प्रति वफादारी को देखते हुए उसे माओवादियों की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई ‘सेंट्रल कमेटी’ का सदस्य मनोनीत किया गया था, जो भारत में नक्सलियों का सबसे बड़ा नीतिगत पद माना जाता है।

55 से अधिक संगीन मामलों का आरोपी

सुरक्षा रिकॉर्ड्स के अनुसार, असीम मंडल के खिलाफ झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में 55 से अधिक गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से अधिकांश मामले सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करने,  पुलिस हथियार लूटने, आईईडी विस्फोट करने और निर्दोष ग्रामीणों की ‘जनअदालत’ लगाकर हत्या करने से जुड़े हैं।

सारंडा और कोल्हान के जंगलों में हुए कई ऐसे बड़े नक्सली हमले हैं, जिनकी स्क्रिप्ट असीम मंडल ने ही लिखी थी। वह सुरक्षा बलों के लिए एक ‘भूत’ की तरह था, जो हमला करने के बाद घने जंगलों का फायदा उठाकर गायब हो जाता था।

क्यों घुटने टेकने पर मजबूर हुए नक्सली?

असीम मंडल का आत्मसमर्पण यह साबित करता है कि झारखंड सरकार और राज्य पुलिस की ‘डबल स्ट्रैटेजी’ (आक्रामक अभियान + आकर्षक पुनर्वास नीति) पूरी तरह सफल रही है। झारखंड पुलिस के महानिरीक्षक (आईजी अभियान) ने स्पष्ट कहा था कि उग्रवादियों के पास अब केवल दो ही रास्ते बचे हैं—”या तो वे आत्मसमर्पण करें या फिर सुरक्षा बलों की गोलियों का सामना करने के लिए तैयार रहें।” असीम मंडल ने पहला रास्ता चुनना ही मुनासिब समझा।

 अब झारखंड में बचे हैं सिर्फ ’14’ माओवादी: संगठन का ढांचा ध्वस्त

सुरक्षा बलों के दावों के मुताबिक, असीम मंडल के आत्मसमर्पण के बाद झारखंड अब लगभग पूरी तरह माओवादी मुक्त होने की कगार पर है। खुफिया ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में अब केवल 14 कुख्यात या वांटेड माओवादी ही बचे हैं, जो सुरक्षा बलों की हिट-लिस्ट में हैं।

माओवादियों का एक और शीर्ष नेता, मिसिर बेसरा, जो एक करोड़ का इनामी है, वह भी अब अपने दस्ते से कट चुका है और उसके पास उंगलियों पर गिनने लायक ही लोग बचे हैं। असीम मंडल के सरेंडर के बाद मिसिर बेसरा का मनोवैज्ञानिक मनोबल पूरी तरह टूट चुका है।

असीम मंडल का आत्मसमर्पण लाल आतंक के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा। 40 साल तक बंदूकों के दम पर कथित क्रांति का सपना देखने वाले ‘आकाश’ का जमीन पर आना यह साबित करता है कि हिंसा कभी भी लोकतंत्र और विकास का विकल्प नहीं हो सकती। झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की यह साझा जीत इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगी।

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