आईविजन व्यूरो
हाल ही में सरकार ने देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) के ताजा आंकड़े जारी किए हैं। सरकारी स्तर पर ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष (2026-27) की पहली तिमाही में भारत ने 7.8 फीसदी की शानदार वृद्धि दर्ज की है। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने इसे वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक ‘असाधारण उपलब्धि’ करार दिया है। लेकिन जैसे ही आंकड़ों की परतों को खोला गया, इस तथाकथित विकास दर की चमक फीकी पड़ने लगी। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कई दिग्गज अर्थशास्त्रियों ने सरकार के इन आंकड़ों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका दावा है कि अगर पुरानी व्यवस्था से हिसाब लगाया जाए, तो यह विकास दर महज 2.6 फीसदी बैठती है।
अब आम आदमी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक ही देश की अर्थव्यवस्था में अचानक 7.8% और 2.6% का यह भारी अंतर कहां से आ गया? क्या यह कोई वित्तीय जादू है या फिर आंकड़ों की कुशल बाजीगरी?
इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें सांख्यिकी के ‘बेस ईयर’ यानी आधार वर्ष के गणित को बेहद सरल तरीके से समझना होगा। मान लीजिए कि आपका वजन पिछले साल 86 किलो था और इस साल वह बढ़कर 88 किलो हो गया। सीधे तौर पर आपके वजन में केवल 2 किलो की मामूली बढ़ोतरी हुई। लेकिन अगर कोई चालाकी से पिछले साल की पुरानी मशीन को हटाकर नई मशीन ले आए और कहे कि नई मशीन के हिसाब से पिछले साल आपका वजन 86 नहीं बल्कि सिर्फ 80 किलो था, तो अचानक कागजों पर आपकी बढ़ोतरी 2 किलो की जगह 8 किलो दिखने लगेगी। वजन नापने की मशीन बदलने के इसी खेल को अर्थशास्त्र की भाषा में ‘आधार वर्ष में संशोधन’ (Base Year Revision) कहते हैं।
सरकार ने हाल ही में जीडीपी गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया है। इस नई व्यवस्था के तहत पिछले साल की पहली तिमाही के नॉमिनल जीडीपी के आंकड़े को संशोधित करके 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। जब पिछले साल का आधार ही कागजों पर छोटा कर दिया गया, तो इस साल का 88.27 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा गणितीय रूप से अपने आप 7.8 फीसदी की बड़ी छलांग दिखाने लगा। अगर सरकार पिछले साल के मूल आंकड़े (86 लाख करोड़) से इस साल की तुलना करती, तो यह वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत ही रह जाती।
रोजगार और ग्रामीण भारत का असली संकट
एक आम नागरिक के लिए यह आंकड़ों का खेल केवल तब तक मनोरंजक हो सकता है जब तक इसका असर उसकी जेब पर न पड़े। सवाल यह है कि यदि देश वाकई 7.8% की दर से ‘दौड़’ रहा है, तो देश का पढ़ा-लिखा युवा रोजगार के लिए दर-दर क्यों भटक रहा है? पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश में युवा बेरोजगारी दर 15% से 16% के खतरनाक स्तर पर बनी हुई है। इससे भी डरावनी हकीकत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट उजागर करती है, जिसके मुताबिक भारत में कुल बेरोजगारों में पढ़े-लिखे युवाओं की हिस्सेदारी 65% से अधिक है।
यही विरोधाभास हमारे ग्रामीण संकट में भी दिखता है। सरकारी दावों के विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग और सेवा क्षेत्र पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहे हैं। गांवों में कृषि आय लगातार घट रही है और खेती की लागत महंगी हो रही है। स्थिति यह है कि रोजगार न मिलने के कारण ग्रामीण भारत में एक बड़ी आबादी ‘अप्रत्यक्ष बेरोजगारी’ का शिकार है, जहां एक ही खेत में जरूरत से ज्यादा लोग जबरन काम में लगे हैं क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है।
सच्चाई यह है कि जीडीपी का यह नया पैमाना केवल कागजों पर ‘आर्थिक वसंत’ का भ्रम पैदा कर रहा है। सरकारें हेडलाइंस (सुर्खियां) तो मैन्युफैक्चर कर सकती हैं, लेकिन वे आंकड़ों के हेरफेर से जमीन पर नौकरियां पैदा नहीं कर सकतीं। अर्थव्यवस्था का वास्तविक स्वास्थ्य केवल बड़ी संख्याएं दिखाने से नहीं, बल्कि आम जनता की क्रय शक्ति और जीवन स्तर के सुधरने से तय होता है। वक्त आ गया है कि हम सांख्यिकी के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत का सामना करें।













Leave a Reply