आईजन व्यूरो
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां राजनीति लोक-कल्याण का माध्यम न रहकर एक सुनियोजित ‘धंधा’ बनती जा रही है। एक तरफ देश की आम जनता दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे-पैसे को मोहताज है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दल, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CAs) और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ मिलकर बंद कमरों में करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर रहे हैं। हाल ही में हुए चुनावी चंदे के खेल के खुलासे ने इस कड़वी हकीकत को पूरी तरह उजागर कर दिया है। यह खेल बड़े और मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से कहीं आगे निकलकर, उन दलों की चौखट तक पहुंच गया है जिनका नाम शायद ही देश के आम नागरिक ने कभी सुना हो। देश की पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (RUPPs) के जरिए चल रहे एक अभूतपूर्व वित्तीय खेल का खुलासा हुआ है।
1 उम्मीदवार, बंद दफ्तर और ₹620 करोड़ का चंदा
इस पूरे खुलासे का सबसे चौंकाने वाला केंद्र बिंदु ‘आम जनमत पार्टी‘ नाम का एक गुमनाम दल है। इस अकेली गुमनाम पार्टी को वित्त वर्ष 2023-24 में ₹620.24 करोड़ से अधिक का भारी-भरकम चंदा मिला।
यह राशि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को मिले कुल चंदे (₹281 करोड़) से भी दोगुनी से अधिक है। इतनी विशाल धनराशि प्राप्त करने के बावजूद, 2024 के लोकसभा चुनाव में इस पार्टी ने पूरे देश में सिर्फ 1 उम्मीदवार मैदान में उतारा था। इस पार्टी के चुनाव आयोग में दर्ज पते पर पड़ताल की गई, तो गुजरात (अहमदाबाद) में इसका पंजीकृत दफ्तर बंद मिला, इसके पदाधिकारी गायब मिले और इसके पदाधिकारियों ने कैमरे के सामने आने से साफ इनकार कर दिया।
गुजरात के Naroda का नया ‘फंडिंग हब‘
पड़ताल में यह बात भी सामने आई कि सिर्फ आम जनमत पार्टी ही नहीं, बल्कि गुजरात में पंजीकृत ऐसी 6 गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां (RUPPs) हैं, जिन्होंने मिलकर वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान करीब ₹1,700 करोड़ का चंदा बटोर लिया।
हैरानी की बात यह है कि देश की 5 प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा, सीपीएम और एनसीपी) का कुल संयुक्त चंदा भी लगभग ₹1,480 करोड़ ही था। यानी इन 6 गुमनाम पार्टियों का फंड प्रमुख राष्ट्रीय दलों से भी ज्यादा रहा, जबकि 2024 के आम चुनाव में इन सभी 6 पार्टियों ने मिलकर पूरे देश में महज 15 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से चार पार्टियां तो अहमदाबाद के एक ही इलाके (नरोदा) से संचालित हो रही थीं। इन अन्य बड़ी संदिग्ध पार्टियों में शामिल हैं।
- सत्यवादी रक्षक पार्टी: ₹330 करोड़ का चंदा (खर्च लोक कल्याण के नाम पर दिखाया गया पर कोई रिकॉर्ड नहीं)।
- स्वतंत्र अभिव्यक्ति पार्टी: ₹219 करोड़।
- न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी: ₹200 करोड़।
- भारतीय नेशनल जनता दल: ₹191 करोड़।
- गरीब कल्याण पार्टी: ₹138 करोड़।
मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स छूट का खेल?
जनता के मन में उठने वाला सबसे वाजिब सवाल यही है कि इन कागज़ी पार्टियों को आखिर करोड़ों रुपये चंदा दे कौन रहा है और क्यों? राजनीतिक विश्लेषकों और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की पूर्व चेतावनियों के अनुसार, गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को मिलने वाली शत-प्रतिशत आयकर छूट का दुरुपयोग काले धन को सफेद करने और टैक्स चोरी के लिए एक माध्यम के रूप में किया जा रहा है। कॉरपोरेट घराने और बड़े व्यापारी शेल कंपनियों और इन फर्जी राजनीतिक दलों के खातों में पैसा जमा करवाकर बोगस डोनेशन रसीदें हासिल करते हैं।
एक तरफ देश का ईमानदार टैक्सपेयर एक-एक पैसे के लिए नियम-कायदों से बंधा है, वहीं दूसरी तरफ सीए (CAs), फर्जी नेता और उद्योगपतियों का यह गठजोड़ आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की नाक के नीचे सैकड़ों करोड़ का वारा-न्यारा कर रहा है। विपक्षी दलों ने इस खुलासे के बाद तीखे सवाल उठाए हैं और इसे लोकतंत्र के साथ एक बहुत बड़ा वित्तीय खिलवाड़ करार दिया है। जब तक चुनाव आयोग इन ‘पेपर पार्टियों’ के बैंक खातों पर सख्त कार्रवाई नहीं करता और सुप्रीम कोर्ट इस पर स्वतः संज्ञान नहीं लेता, तब तक चुनावी शुचिता का यह सफेदपोश धंधा इसी तरह फलता-फूलता रहेगा।













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