JHAHIN/2014/58773

बंगाल भाजपा के गले की हड्डी बन गए पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री

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आईवीजन व्यूरो

हावड़ा। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर बाबा) के दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन और संस्कृति से जुड़े बयानों ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक घमासान खड़ा कर दिया है, जिसके चलते यह मुद्दा बंगाल बीजेपी के लिए ‘गले की हड्डी’ बन गया है।

हावड़ा में अपनी ‘हनुमंत कथा’ के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने बंगालियों से दुर्गा पूजा के उत्सव के दौरान नॉन-वेज भोजन और शराब से परहेज करने की अपील की थी। उनके इस बयान ने बंगाल की उस सांस्कृतिक और खानपान की पहचान को झकझोर दिया, जहां मछली और मांस का सेवन व मां काली को बलि चढ़ाने की परंपरा सदियों से सह-अस्तित्व में रही है।

TMC की तीखी प्रतिक्रिया और चौतरफा हमला

इस स्थिति का फायदा उठाते हुए सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और अन्य राजनीतिक विरोधियों ने बीजेपी को चौतरफा घेरना शुरू कर दिया है। TMC नेताओं ने इसे बंगाली अस्मिता और खानपान की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया। विपक्ष ने यह नैरेटिव बनाने में देर नहीं लगाई कि बाहर से आने वाले धार्मिक चेहरे बंगाल की संस्कृति पर अपने विचार थोप रहे हैं और बीजेपी समर्थित राजनीति बंगालियों की खानपान की आजादी पर प्रतिबंध लगाना चाहती है।

बढ़ते नुकसान को देख बीजेपी का किनारा

आगामी चुनावी मैदान में क्षेत्रीय अस्मिता और खानपान की स्वतंत्रता से समझौता करना पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है, इस बढ़ते राजनीतिक नुकसान को भांपते हुए पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य  को तुरंत सामने आकर धीरेंद्र शास्त्री के बयान से पूरी तरह किनारा करना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “कोई धार्मिक व्यक्ति या राजनीतिक पार्टी यह तय नहीं कर सकती कि पश्चिम बंगाल के लोग क्या खाएं या क्या पहनें; बंगाली वही खाएंगे जो उनका मन करेगा।”

चुनावों पर सीधा असर और असमंजस की स्थिति

बंगाल के आगामी चुनावों के लिहाज से यह विवाद बीजेपी के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है। एक तरफ जहां सुवेंदु अधिकारी जैसे शीर्ष नेता बाबा का खुलकर स्वागत कर रहे हैं और राज्य में बागेश्वर धाम का केंद्र बनाने की वकालत कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बाबा के इस बयान से उपजा जन-आक्रोश बीजेपी के उस स्थानीय बंगाली समीकरण को बिगाड़ रहा है, जिसे पार्टी बड़ी सावधानी से बुन रही थी। हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश में जुटी बीजेपी के लिए बंगाली समाज के भीतर ही सांस्कृतिक दरार पैदा होना चुनावी रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। यही वजह है कि बाबा के बेबाक बोल अब बंगाल बीजेपी के लिए उगलते-निगलते न बनने वाली फांस बन चुके हैं।

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