JHAHIN/2014/58773

ऊर्जा कूटनीति का नया क्षितिज और भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता

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नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीति में खाड़ी देशों की अशांति हमेशा से भारत की रसोई से लेकर औद्योगिक पहियों तक को प्रभावित करती रही है। हाल ही में अखबारों में छपी एख रिपोर्ट ने वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर एक बड़े और युगांतरकारी बदलाव की पुष्टि की है। पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष, विशेषकर ईरान, इजरायल और अमेरिका के त्रिकोणीय युद्ध के चलते वैश्विक ऊर्जा के सबसे संवेदनशील मार्ग—होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बंद होने से भारत की पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई थी। लेकिन इस संकट के बीच भारत ने जिस रणनीतिक चपलता और कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। भारत के कुल एलपीजी (LPG) आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक (मार्च से अगस्त के बीच करीब 53%) हो गई है, जो पूर्ववर्ती छह महीनों में महज 7.9% से भी कम हुआ करती थी।  

यह बदलाव केवल व्यापारिक आंकड़ों का उलटफेर नहीं है, बल्कि भारत की ‘ऊर्जा सुरक्षा कूटनीति’ का एक नया मील का पत्थर है। भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है और इस संकट से पहले देश की 90 प्रतिशत एलपीजी खाड़ी देशों से आती थी। होर्मुज संकट के कारण संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आने वाला आयात करीब 80% तक गिर गया, जबकि सऊदी अरब से होने वाली आपूर्ति जुलाई और अगस्त के महीनों में शून्य पर पहुंच गई। ऐसे गंभीर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़े होकर भी देश में रसोई गैस की किल्लत न होना यह दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक झटकों को सहने के लिए परिपक्व हो चुका है। अमेरिकी बाजारों से ‘स्पॉट परचेज’ (तत्काल खरीद) बढ़ाकर भारतीय तेल विपणन कंपनियों ने न केवल आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखा, बल्कि घरेलू मोर्चे पर किसी बड़े हाहाकार को भी टाल दिया।

हालांकि, इस रणनीतिक विविधीकरण (Diversification) के साथ भारत के सामने कुछ गंभीर लॉजिस्टिक और वित्तीय चुनौतियां भी उभर कर आई हैं। खाड़ी देशों से एलपीजी जहाजों को भारत के पश्चिमी तट तक पहुंचने में अमूमन 3 से 4 दिन का समय लगता था। इसके विपरीत, अब अमेरिकी शहर ह्यूस्टन से पनामा नहर के रास्ते भारत तक एलपीजी लाने में यात्रा का समय बढ़कर 30 से 45 दिन हो गया है। यह लंबी दूरी न केवल जहाजों के भाड़े (Freight Cost) को बढ़ाती है, बल्कि भारतीय कंपनियों के लिए अधिक ‘वर्किंग कैपिटल’ और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग भी पैदा करती है। इसके अलावा, अमेरिकी ‘मोंट बेलव्यू’  प्राइसिंग फ्रेमवर्क के तहत दरों में उतार-चढ़ाव भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर भी अप्रत्यक्ष दबाव डाल रहा है, जिसके कारण हाल के दिनों में ईंधन की कीमतों में आंशिक बढ़ोतरी देखी गई है।

लॉजिस्टिक की इन विसंगतियों के बावजूद, अमेरिका से यह बढ़ती ऊर्जा साझेदारी भारत-अमेरिकी रणनीतिक द्विपक्षीय संबंधों को एक नया सुरक्षा कवच प्रदान करती है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत अब किसी एक क्षेत्र या देशों के समूह का बंधक बनकर नहीं रह सकता। यह घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए एक सबक भी है कि स्थायी समाधान केवल आयात के स्रोतों को बदलने में नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर रिफाइनरी क्षमताओं को अपग्रेड करने और बायोगैस जैसे नवीकरणीय ऊर्जा विकल्पों को तेजी से अपनाने में है।

 पश्चिम एशिया के संकट काल में अमेरिका का भारत के सबसे बड़े एलपीजी आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरना देश की ‘सामरिक स्वायत्तता’ की जीत है, जिसने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक भारत अपनी संप्रभुता और घरेलू आवश्यकताओं की रक्षा के लिए भू-राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने की पूरी क्षमता रखता है।

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