झाड़ग्राम। रेशम उत्पादन की जमीनी समस्याओं को समझने और उनके तकनीकी समाधान तलाशने के लिए नयाग्राम के केशररेखा गांव में किसानों और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की सहभागी बैठक आयोजित की गई। केंद्रीय रेशम बोर्ड के ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान’ (एमआरएमए) कार्यक्रम के तहत हुई इस बैठक में ग्रामीण महिलाओं ने खुद अपनी प्रमुख समस्याएं चिन्हित कर उनकी प्राथमिकता तय की।
कार्यक्रम का नेतृत्व केंद्रीय रेशम बोर्ड की वैज्ञानिक-बी गंगूबाई एस. मनगुली ने किया। प्रादन के समन्वयक तनॉय नियोगी और चंद्रमोहन ने सहयोग किया। बैठक में हेमाम्बुरू, मोरीमल, मंडी और मां बसंती स्वयं सहायता समूहों के सदस्य शामिल हुए।
बैठक में पारंपरिक तरीके से केवल तकनीकी जानकारी देने के बजाय समूह चर्चा और व्यावहारिक अभ्यास के जरिए समस्याओं की पहचान कराई गई। प्रतिभागियों ने रेशम उत्पादन से जुड़ी दिक्कतों पर चर्चा की और उनकी गंभीरता व बार-बार सामने आने की स्थिति के आधार पर प्राथमिकता तय की।
कार्यक्रम में कीट पहचान का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया। कीट पहचान संबंधी पुस्तिकाओं की मदद से प्रतिभागियों को रेशम उत्पादन क्षेत्र में पाए जाने वाले सामान्य कीटों की पहचान तथा हानिकारक कीटों को अलग करने की जानकारी दी गई। इसके बाद कीट एवं रोग प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों पर चर्चा हुई।
सहभागी प्रक्रिया से सामने आई समस्याओं से तकनीकी टीम को ग्रामीण स्तर की वास्तविक जरूरतों को समझने में मदद मिली। कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिकों और ग्रामीण समुदायों के बीच सीधा संवाद मजबूत करना तथा किसानों की जरूरत के अनुरूप तकनीकी समाधान विकसित करना है।













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