JHAHIN/2014/58773

हेमंत सरकार के आदेश पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, अभ्यर्थियों का अधर में भविष्य

Spread the love

झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार की राजनीति ने एक बार फिर राज्य को गंभीर प्रशासनिक एवं कानूनी चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। झारखंड हाई कोर्ट द्वारा 11वीं से 13वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और अन्य नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाना एक बेहद संवेदनशील मोड़ है। एक तरफ जहां इस आदेश ने सेवा में आ चुके और नियुक्ति का इंतजार कर रहे हजारों मेधावी अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ इसने राज्य सरकार की त्वरित नीतिगत निर्णयों की अपरिपक्वता और कानूनी कमियों को भी उजागर किया है। हाई कोर्ट की यह टिप्पणी कि सरकार का यह कदम नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है, इस बात का प्रमाण है कि लोकलुभावन दबावों के आगे व्यवस्था के कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज किया गया।  

इस पूरे विवाद की जड़ें पिछले 25 दिनों से चल रहे उग्र छात्र आंदोलन थीं, जो पेपर लीक और कथित अनियमितताओं की जाँच की मांग को लेकर शुरू हुआ था। सरकार आंदोलनकारी छात्रों को समझाने और बीच का रास्ता निकालने का लगातार प्रयास कर रही थी, लेकिन छात्र सभी परीक्षाएं रद्द करने और केंद्रीय जांच की मांग पर अड़े रहे। राजनीतिक दबाव और छात्रों के असंतोष को शांत करने के लिए हेमंत सोरेन सरकार  ने आनन-फानन में परीक्षाओं को सामूहिक रूप से रद्द करने की अधिसूचना जारी कर दी। कानूनी विशेषज्ञों द्वारा यह पहले से ही माना जा रहा था कि यह निर्णय बिना किसी ठोस व्यक्तिगत जांच के टिक नहीं पाएगा। किसी भी बड़ी परीक्षा में गड़बड़ी की स्थिति में दोषीऔर निर्दोषअभ्यर्थियों के बीच अंतर करना अनिवार्य होता है। पूरी परीक्षा और नियुक्तियों को एकमुश्त खारिज करना उन छात्रों के साथ सरासर अन्याय था जिन्होंने अपनी ईमानदारी और मेहनत से सफलता पाई थी।

अदालत के इस फैसले से जो अभ्यर्थी नौकरी पा चुके हैं या अंतिम रूप से चयनित हो चुके हैं, उन्हें फौरी सुरक्षा तो मिल गई है, लेकिन उनके भविष्य की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। नौकरी में आ चुके इन अधिकारियों के सिर पर अब कानूनी अनिश्चितता की तलवार लटकती रहेगी। प्रशासनिक दक्षता के दृष्टिकोण से देखें, तो जब तक इस मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक ये कर्मचारी मानसिक तनाव में काम करेंगे, जिसका सीधा असर राज्य की शासन व्यवस्था पर पड़ेगा। सरकार को अब 15 सितंबर तक हाई कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करना है। यदि सरकार कोर्ट में कोई पुख्ता और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाती है, तो उसकी भारी किरकिरी होना तय है। यह स्थिति झारखंड की समूची चयन प्रणालियों (JPSC और JSSC) की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान है। छात्र आंदोलन के आक्रोश को केवल परीक्षाओं को निरस्त करके शांत नहीं किया जा सकता, और न ही नियुक्तियों पर रोक लगाकर न्याय किया जा सकता है। वास्तविक समाधान परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाना, पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून लागू करना और समयबद्ध तरीके से जांच पूरी करना है। सरकार को अब एक ऐसी संतुलित नीति अपनानी होगी जो आंदोलनकारी छात्रों की चिंताओं को भी संबोधित करे और बिना किसी गलती के नौकरी गंवाने के कगार पर पहुंचे युवाओं के अधिकारों की भी रक्षा करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *