विकास मक्कड़. दिल्ली
भारत की वित्तीय व्यवस्था के माथे पर यह ताज़ा धब्बा किसी साधारण अदालती फैसले का परिणाम नहीं, बल्कि उस गहरी नाकामी का प्रतीक है जो वर्षों से कॉरपोरेट कर्ज़ निपटान की प्रक्रिया में छिपी रही है। एनसीएलटी के हालिया निर्णय में सुभाष चंद्रा के गारंटर मामले में लगभग 22,006 करोड़ रुपये के दावे महज 6.5 करोड़ रुपये में निपटा दिए गए। यानी हर सौ रुपये पर केवल तीन पैसे की वसूली। इसे “हेयरकट” कहना भी वित्तीय शब्दावली का अपमान है, यह तो जनता के पैसों का खुला मुंडन है।
कर्ज़ निपटान या कर्ज़ माफी?
आईबीसी कोड 2016 का उद्देश्य था कि बैंकों और लेनदारों को समयबद्ध समाधान देना। लेकिन जब समाधान का अर्थ ही कर्ज़दारों को कौड़ियों के भाव मुक्त करना बन जाए, तो यह कानून अपने मकसद से भटक चुका है। नवंबर 2024 में 80% से अधिक वोटिंग हिस्सेदारी वाले लेनदारों ने इस योजना को मंजूरी दी, जबकि एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, कैनरा बैंक, आरबीएल बैंक और एक्सिस बैंक जैसे संस्थानों ने इसका विरोध किया। उनका आरोप था कि वोटिंग में निर्णायक हिस्सेदारी रखने वाली कंपनियां स्वयं सुभाष चंद्रा से जुड़ी हुई हैं।
नेटवर्थ का रहस्य
2017-18 में बैंकों के प्रमाणपत्रों में उनकी नेटवर्थ 40-45 हजार करोड़ रुपये बताई गई थी। आज घोषित नेटवर्थ मात्र 31.8 करोड़ रुपये रह गई है। हजारों करोड़ रुपये कहां गायब हो गए, इस पर कोई ठोस जांच नहीं हुई। एनसीएलटी ने फोरेंसिक ऑडिट तक को ज़रूरी नहीं समझा। यह वही व्यवस्था है जो आम आदमी के छोटे कर्ज़ पर सख़्ती दिखाती है, लेकिन बड़े प्रमोटर्स के मामले में आंख मूंद लेती है।
सरकार की भूमिका पर सवाल
कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की चुप्पी सबसे अधिक खटकती है। जब सार्वजनिक बैंकों का पैसा डूब रहा था, तब मंत्रालयों की भूमिका क्या थी? यह पैसा करदाताओं का है, आम आदमी का है। जिस व्यवस्था को जनता ने अपने पसीने की कमाई सौंपी, वही व्यवस्था बड़े घरानों के लिए “माफी मंच” बन गई।
लोकतंत्र में जवाबदेही
यह केवल एक अदालती फैसला नहीं, बल्कि उस ढीली व्यवस्था का प्रमाण है जो बड़े उद्योगपतियों को बचाने के लिए बनाई गई है। छोटे किसान का कर्ज माफ करने पर हज़ार सवाल उठते हैं, लेकिन अरबों-खरबों के कॉरपोरेट कर्ज़ पर सरकार और संस्थान चुप रहते हैं। यह दोहरी नीति लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाती है।
यह मामला केवल वित्तीय घाटे का नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का है। जब जनता का पैसा इस तरह से रफादफा किया जाता है, तो यह व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि जानबूझकर दी गई ढिलाई है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट है। अगर सरकारें और संस्थान जनता के पैसे की रक्षा नहीं कर सकते, तो जनता को ही तय करना होगा कि ऐसे “मुंडन संस्कार” कब तक सहने हैं।













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