धर्मेंद्र कुमार
जमशेदपुर की लाइफलाइन कही जाने वाली मरीन ड्राइव आज रात ढलते ही मौत का खुला कॉरिडोर बन चुकी है। दिन में सुव्यवस्थित दिखने वाली सड़कें रात होते ही कबाड़खाने में तब्दील हो जाती हैं।
बिष्टुपुर से लेकर सोनारी, कदमा और मानगो को जोड़ने वाले इस वीआईपी मार्ग पर भारी ट्रकों और ट्रेलरों का अवैध जमावड़ा प्रशासनिक लाचारी नहीं, बल्कि ट्रैफिक पुलिस की आपराधिक अनदेखी का नतीजा है। यह कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘डेथ ट्रैप’ है जो हर रात किसी न किसी मासूम की जान लेने के लिए तैयार खड़ा रहता है।
अवैध ‘ओपन एयर’ गैरेज
नो-इंट्री खुलने से पहले ही मरीन ड्राइव की दोनों लेन पर किलोमीटर लंबी कतारें खड़ी कर दी जाती हैं। कई जगह बीच सड़क पर ही ट्रकों की मरम्मत शुरू हो जाती है, जिससे आधी सड़क ब्लॉक हो जाती है। इन वाहनों पर न रिफ्लेक्टर लाइट होती है, न सुरक्षा संकेतक। नतीजा—रात के अंधेरे में दोपहिया या चौपहिया वाहन सीधे इन ‘लोहे के पहाड़ों’ से टकरा जाते हैं और मौत का तांडव शुरू हो जाता है।
पुलिस पेट्रोलिंग की नाकामी
दावा किया जाता है कि पीसीआर और हाईवे पेट्रोलिंग गाड़ियां लगातार गश्त करती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक मरीन ड्राइव पर पुलिस पूरी तरह नदारद रहती है। कभी-कभार दिखने वाली वैन भी केवल औपचारिकता निभाकर आगे बढ़ जाती है। यही निष्क्रियता ट्रक ऑपरेटरों को इतना बेलगाम बना चुकी है कि वे पूरे मरीन ड्राइव को अपनी जागीर समझने लगे हैं।
प्रशासन को जागना ही होगा
मरीन ड्राइव पर लगातार होती मौतें केवल आंकड़े नहीं, बल्कि बिखरते परिवारों की सिसकियां हैं। जब तक प्रशासन रात में क्रेन के जरिए अवैध पार्किंग हटाने का अभियान नहीं चलाएगा, जब तक स्पीड गवर्नर और रिफ्लेक्टर लाइटों की जांच अनिवार्य नहीं होगी, और जब तक पेट्रोलिंग को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा—तब तक मासूमों का खून बहता रहेगा। अब और लाशें उठाने की ताक़त इस शहर में नहीं बची है।













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