गृह मंत्रालय अपना, पुलिस अपनी, फिर कांग्रेस दफ्तर के बाहर क्यों गरज रही है भाजपा?
धर्मेंद्र
भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद और विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण माने जाते हैं। लेकिन, जब विरोध की यह राजनीति प्रासंगिक मुद्दों को छोड़कर महज प्रतीकात्मक नौटंकी और अराजकता का रूप लेने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के गिरते स्तर का संकेत होती है। हाल ही में जमशेदपुर स्थित कांग्रेस मुख्यालय के बाहर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा किया गया उग्र प्रदर्शन इसी भटकाव की राजनीति का एक ज्वलंत उदाहरण है। देश की किसी भी घटना पर जनभावनाओं को अभिव्यक्त करना राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन उस प्रदर्शन का भौगोलिक और संवैधानिक औचित्य क्या है, यह सवाल आज बौद्धिक विमर्श के केंद्र में है।
राजनीतिक विश्लेषकों और सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं का तर्क है कि दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की घटना और कांग्रेस के एक सांसद पर पॉक्सो एक्ट के तहत लगे आरोपों को लेकर जमशेदपुर की सड़कों पर हंगामा खड़ा करना विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक स्टंट है। देश की प्रशासनिक व्यवस्था से वाकिफ कोई भी सामान्य नागरिक जानता है कि देश की राजधानी दिल्ली की कानून-व्यवस्था और वहां की पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। ऐसे में यदि किसी सांसद पर लगे संगीन आरोपों के बावजूद उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पा रही है, तो जवाबदेही सीधे तौर पर केंद्रीय गृहमंत्री और दिल्ली पुलिस प्रशासन की बनती है। यदि भाजपा को इन कथित विसंगतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी ही थी, तो उन्हें केंद्रीय गृहमंत्री के आवास या दिल्ली के प्रशासनिक गलियारों में प्रदर्शन करना चाहिए था, न कि जमशेदपुर के जिला कांग्रेस कार्यालय पर।
झारखंड की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर डालें, तो विपक्षी खेमे में एक अजीब सी छटपटाहट साफ दिखाई देती है। सत्ता पक्ष का आरोप है कि राज्य की हेमंत सोरेन सरकार को प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से अस्थिर करने के तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार की सेहत पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। ‘मंईयां सम्मान योजना’ जैसी लोक-कल्याणकारी नीतियों और ग्रामीण विकास के एजेंडे के सहारे मौजूदा सरकार अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत बनाए रखने में सफल दिख रही है। ऐसे में विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे कई मुद्दों को जनता गंभीरता से नहीं ले रही है, क्योंकि उनमें जनहित से जुड़े बुनियादी सवालों—जैसे विस्थापन, स्थानीय नियोजन और कृषि संकट—के बजाय केवल राजनीतिक बयानबाजी और प्रतीकात्मक घेराव की अधिकता दिखाई देती है।
जमशेदपुर में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर हुए प्रदर्शन ने एक और गंभीर सवाल को जन्म दिया है, वह है शुचिता और मर्यादा का। विपक्षी दलों द्वारा अक्सर गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक लाभ लेने के लिए महिला मोर्चे को आगे कर देने की रणनीति अपनाई जाती है। किसी भी राजनीतिक दल के मुख्यालय के द्वार पर जाकर उग्र प्रदर्शन करना और वहां प्रशासनिक टकराव की स्थिति पैदा करना किसी भी लिहाज से स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा नहीं माना जा सकता। यह ‘विशुद्ध रूप से अराजकता फैलाने का प्रयास’ हैं। राजनीति का यह दोहरा मापदंड उस पुरानी कहावत को चरितार्थ करता है कि ‘जिसके अपने घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।’ देश के कई राज्यों में विपक्ष में बैठी भाजपा जब सत्ता पक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाती है, तो उसे अपनी इस दमनकारी और आक्रामक रणनीति का भी आत्मपरीक्षण करना चाहिए।
झारखंड के पिछले चुनावी और राजनीतिक इतिहास पर यदि गौर करें, तो यह स्पष्ट होता है कि जब-जब मुख्य मुद्दों—जैसे रोटी, कपड़ा, मकान और स्थानीय अधिकारों—को छोड़कर केवल भावनात्मक या बाहरी मुद्दों पर राजनीति केंद्रित की गई है, तब-तब उसके परिणाम नकारात्मक ही रहे हैं। जनता अब केवल नारों और प्रतीकात्मक प्रदर्शनों से प्रभावित नहीं होती, वह धरातल पर काम देखना चाहती है। विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार की घेराबंदी करने के लिए उसे हवा-हवाई और नौटंकीनुमा प्रदर्शनों के बजाय जनता की बुनियादी समस्याओं को लेकर सदन से सड़क तक एक ठोस और जिम्मेदार नीति अपनानी होगी। जब तक राजनीति में यह परिपक्वता नहीं आएगी, तब तक ऐसे प्रदर्शनों का हश्र केवल जन-परेशानी और राजनीतिक शून्यता के रूप में ही सामने आता रहेगा।
















Leave a Reply