JHAHIN/2014/58773

सोनम वांगचुक की केंद्र को बड़ी चेतावनी: ‘शांतिपूर्ण आवाजों को दबाया तो देश में बन सकते हैं नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात’

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नई दिल्ली। लद्दाख की स्वायत्तता, छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग और नाजुक पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे प्रख्यात पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को एक बेहद गंभीर नसीहत और चेतावनी दी है। नई दिल्ली में जारी अपने हालिया बयान में वांगचुक ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि सरकार जनता के शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक जन-प्रदर्शनों की आवाज को सुनने के बजाय उसे अर्धसैनिक बलों के दम पर दबाने का प्रयास करेगी, तो देश में पड़ोसी देशों—नेपाल और बांग्लादेश जैसे गंभीर और अस्थिर हालात पैदा हो सकते हैं।

लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करने की अपील

सोनम वांगचुक ने जोर देकर कहा कि लद्दाख के लोग पिछले कई महीनों से पूरी तरह शांतिपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी जायज मांगों को सरकार के सामने रख रहे हैं। उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी लोकतांत्रिक देश में जनता की जायज और शांतिपूर्ण आवाजों को बंदूक या सुरक्षाबलों के जरिए कुचलने की कोशिश की गई है, तब-तब उसके परिणाम बेहद विनाशकारी रहे हैं।” उन्होंने हाल ही में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और नेपाल के राजनीतिक इतिहास का उदाहरण देते हुए केंद्र सरकार को आत्ममंथन करने की सलाह दी।

लद्दाख की चार मुख्य मांगें जिन पर अड़ा है आंदोलन

वांगचुक के नेतृत्व में लद्दाख के नागरिकों और विभिन्न संगठनों का यह आंदोलन मुख्य रूप से चार सूत्रीय मांगों पर केंद्रित है।  लद्दाख की जनजातीय संस्कृति और भूमि को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करना। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश से अपग्रेड कर पूर्ण राज्य का दर्जा देना। लोकसभा में लद्दाख के लिए दो सीटें सुनिश्चित करना। स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण और लद्दाख लोक सेवा आयोग का गठन।

दिल्ली तक पदयात्रा के बाद भी नहीं निकला ठोस समाधान

उल्लेखनीय है कि हाल ही में सोनम वांगचुक के नेतृत्व में सैकड़ों लद्दाखियों ने लेह से दिल्ली तक की लंबी पैदल मार्च (पदयात्रा) की थी। दिल्ली सीमा पर हिरासत में लिए जाने और भारी विरोध के बाद उन्हें राजघाट जाने की अनुमति मिली थी। वांगचुक ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि शीर्ष नेतृत्व से मुलाकातों के आश्वासनों के बावजूद अब तक लद्दाख के भविष्य को लेकर कोई ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लद्दाख की उपेक्षा जारी रही, तो यह सीमावर्ती क्षेत्र की सुरक्षा और देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं होगा।

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