वर्ष 2025 में जिले में कुल 273 सड़क हादसों में 176 लोगों की हुई असमय मौत
धर्मेंद्र कुमार
जमशेदपुर।लौहनगरी जिसे कभी अपनी सुव्यवस्थित शहरी संरचना और अनुशासित जीवनशैली के लिए जाना जाता था, आज उसकी पहचान ‘मौत के गलियारे’ के रूप में होने लगी है। शहर में लगातार हो रहे भीषण सड़क हादसे अब महज ‘दुर्घटनाएं’ नहीं रह गए हैं, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता, बेलगाम कॉरपोरेट लालच और कानून व्यवस्था के खोखलेपन से मिलकर किया जा रहा एक व्यवस्थित ‘सिस्टमैटिक मर्डर’ है। इस त्रासद हकीकत का सबसे कड़वा सच यह है कि इन हादसों की बलि केवल और केवल आम आदमी ही चढ़ता है। अधिकारी, बड़े नेता, नामी व्यापारी और कॉरपोरेट कंपनियों के आला अफसर चमचमाती चारपहिया गाड़ियों के सुरक्षित सुरक्षा चक्र में चलते हैं, जबकि सड़क पर चलने वाला राहगीर, साइकिल सवार या मध्यमवर्गीय स्कूटी चालक हर पल मौत के साए में सफर करता है।
आंकड़ों की आईना बेहद खौफनाक और शर्मनाक है, क्योंकि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। पूर्वी सिंहभूम जिला सड़क सुरक्षा समिति और आधिकारिक विभागीय रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में जिले के भीतर कुल 273 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 176 लोगों की असमय मौत हुई थी। यह खूनी सिलसिला थमा नहीं है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में ही जिले में 200 से अधिक सड़क हादसे हो चुके हैं, जिसमें 130 से अधिक मासूम लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। औसतन हर महीने लगभग 20 से अधिक घर उजड़ रहे हैं। हाल ही में भुइयांडीह-एग्रीको रोड पर तेज रफ्तार ट्रेलर की चपेट में आने से पिता-पुत्र की हुई दर्दनाक मौत और बर्मामाइंस व मरीन ड्राइव के समीप लगातार टूटती सांसें इस बात का सुबूत हैं कि जमशेदपुर की सड़कों पर यमराज खुलेआम घूम रहे हैं। क्या इन लहूलुहान आंकड़ों को देखने के बाद भी किसी की अंतरात्मा नहीं जागती?
विडंबना देखिए कि यातायात के सारे सख्त नियम, भारी चालान और हेलमेट चेकिंग की औपचारिकताएं सिर्फ आम जनता की जेब ढीली करने के लिए आरक्षित हैं। परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार, शहर के भीतर चलने वाले डंपर और हाइवा जैसे भारी वाहनों में एक सहायक चालक (खलासी) का होना अनिवार्य है, ताकि वे तंग मोड़ों या अंधबिंदुओं (ब्लाइंड स्पॉट्स) पर मुख्य चालक की मदद कर सकें। परंतु, जमशेदपुर में दौड़ रहे सैकड़ों डंपरों में शायद ही कभी कोई सहायक दिखाई देता है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि ट्रैफिक पुलिस ने आखिरी बार कब किसी डंपर या हाइवा को रोककर इस नियम की जांच की थी? जवाब शून्य है।
इस घोर लापरवाही के पीछे जब सिस्टम को खंगाला जाता है, तो दो बड़े कड़वे सच सामने आते हैं—सरकारी खजाने को भरने का लालच और ट्रैफिक पुलिस में मैनपावर का भारी अभाव। एक तरफ जिला प्रशासन और परिवहन विभाग आम दोपहिया वाहनों से हर महीने 20 से 25 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूलने में अपनी बहादुरी समझता है (अकेले मई महीने में ₹23.44 लाख और जून में ₹27.25 लाख वसूले गए), लेकिन दूसरी तरफ जब व्यवस्था सुधारने की बात आती है, तो ‘बल की कमी’ का रोना रोया जाता है। जमशेदपुर में ट्रैफिक पुलिस कर्मियों और कांस्टेबलों की संख्या स्वीकृत पदों के मुकाबले बेहद कम है। जो बल उपलब्ध भी है, उसकी तैनाती भारी गाड़ियों को नियम सिखाने के बजाय चौक-चौराहों पर आम चालकों के चालान काटने में ज्यादा दिखती है। मैनपावर की इसी कमी और प्रशासनिक उदासीनता का फायदा उठाकर नो-इंट्री खुलने के बाद भारी वाहन सारे कायदे कानून को रौंदते हुए चलते हैं।
इससे भी बड़ा घालमेल ‘नो-इंट्री’ के नियमों के साथ हो रहा है। पीक ऑवर्स में, जब स्कूल की बसें और आम जनता सड़कों पर होती है, तब भी जिला प्रशासन द्वारा विशेष ‘पास’ के नाम पर इन भारी वाहनों को शहर के भीतर रेंगने की छूट दे दी जाती है। गोलमरी, साकची और मानगो जैसे व्यस्ततम चौराहों पर स्कूल की छुट्टी के समय भारी गाड़ियों की कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि प्रशासन के लिए बच्चों की जान से ज्यादा कॉरपोरेट कंपनियों का मुनाफा कीमती है। रात के अंधेरे में जैसे ही नो-इंट्री खुलती है, हाइवे और मुख्य सड़कों पर मौत की रेस शुरू हो जाती है। तेज रफ्तार, ओवरलोडिंग और नियमों को रौंदते इन दैत्याकार वाहनों को टोकने के लिए सड़कों पर एक भी ट्रैफिक का जवान मौजूद नहीं होता।
सड़क हादसों का यह दुष्चक्र हर बार एक ही तय पटकथा पर चलता है। कोई बड़ा हादसा होता है, जनता का गुस्सा फूटता है, लोग सड़कों को जाम करते हैं और न्याय की गुहार लगाते हैं। इसके तुरंत बाद हमारे राजनेता ‘बयानवीर’ बनकर टीवी और सोशल मीडिया पर अपनी गहरी संवेदनाओं की नुमाइश करते हैं। प्रशासनिक अफसर ‘हाई-लेवल’ बैठकें बुलाते हैं, ब्लैक स्पॉट्स को ठीक करने का कागजी आश्वासन देते हैं और कुछ दिनों के लिए आधी-अधूरी बैरिकेडिंग लगाकर अपनी जिम्मेदारी का इतिश्री कर लेते हैं। इसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है, मानो कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन उस मां, उस पत्नी या उन अनाथ बच्चों के दर्द को कौन समझेगा, जिनके घर का कमाऊ सदस्य इन सड़कों की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गया? जमशेदपुर की जनता को अब यह समझना होगा कि नेताओं की खोखली संवेदनाओं और अफसरों की आश्वासन वाली घुट्टी से उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने वाली। जब तक प्रशासन नो-इंट्री के नियमों को बिना किसी कॉरपोरेट दबाव के कड़ाई से लागू नहीं करता, जब तक लापरवाह भारी वाहनों के मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होते और जब तक शहर में सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर व फ्लाईओवर का निर्माण नहीं होता, तब तक यह खूनी खेल जारी रहेगा। अब समय आ गया है कि जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन से उनकी जवाबदेही पर सीधे और तीखे सवाल पूछे जाएं, वरना कल किसी और के घर का चिराग बुझेगा और हम फिर एक नई संवेदना का इंतजार कर रहे होंगे।














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