धर्मेंद्र कुमार
विश्व मानचित्र पर अपनी औद्योगिक श्रेष्ठता, सुनियोजित टाउनशिप और अनुशासित जीवनशैली के लिए अलग पहचान रखने वाला जमशेदपुर आज एक बेहद कड़वे और झकझोर देने वाले सच का सामना कर रहा है। लगभग 10 लाख से अधिक की आबादी वाले इस महानगर में विकास की बड़ी-बड़ी इमारतें तो खड़ी हो गईं, लेकिन जब बात यहां के नौनिहालों के सुरक्षित भविष्य और सफर की आई, तो यह शहर नीतिगत रूप से पूरी तरह खोखला साबित हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर यहां का आम नागरिक और छात्र केवल ऑटो, ई-रिक्शा या सीमित रूटों पर रेंगती निजी मिनी बसों के भरोसे रहने को अभिशप्त हैं।
इस अजूबे और दर्दनाक सच को किसी और ने नहीं, बल्कि खुद पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त (डीसी) ने मीडिया के सामने बेहद बेबाकी से स्वीकारा है। उपायुक्त का यह बयान कि “मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि यह इकलौता ऐसा अजूबा शहर है जहां स्कूल बसें नहीं चलती हैं,” दरअसल इस शहर के उन सफेदपोश राजनेताओं, तथाकथित समाजसेवियों और सत्ता के गलियारों में रसूख रखने वाले उन चेहरों के मुंह पर एक करारा तमाचा है, जिनकी पूरी सामाजिक सक्रियता केवल गवर्नर और राष्ट्रपति के साथ तस्वीरें खिंचवाने और उन्हें सोशल मीडिया पर चमकाने तक ही सीमित है।
सत्ता के शीर्ष पर रहने वालों की यह कैसी आत्ममुग्धता?
जमशेदपुर का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि इसी माटी से निकलकर नेताओं ने मुख्यमंत्री, गवर्नर, केंद्रीय मंत्री, सांसद और विधायक जैसे लोकतंत्र के सर्वोच्च पदों को सुशोभित किया है। केंद्र और राज्य सरकारों में रहकर इन सूरमाओं ने अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक उपलब्धियों के बड़े-बड़े झंडे तो गाड़े, लेकिन अफसोस! जब ये अपनी चमचमाती सरकारी गाड़ियों के काफिले से बाहर निकले, तो अपने ही शहर के नौनिहालों की बुनियादी जरूरतों को देखना भूल गए।
जिस शहर ने राज्य और देश को इतनी बड़ी लीडरशिप दी, उस शहर का बच्चा आज सुबह 6 बजे भारी बस्ते का बोझ पीठ पर लादे, किसी ऑटो में भेड़-बकरियों की तरह लदकर या असुरक्षित ई-रिक्शा में लटककर स्कूल जाने को अभिशप्त है। क्या हमारे माननीयों की अंतरात्मा कभी इन बच्चों को देखकर कचोटती नहीं? विदेश की तर्ज पर विकास का ढोल पीटने वाली सरकारें और राजनेता आखिर अपने ही घर के बच्चों के बुनियादी हक पर इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? यह नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि सीधे-सीधे उस जनता के साथ विश्वासघात है जिसने इन नेताओं को फर्श से उठाकर अर्श पर बैठाया।
कबाड़ में तब्दील हुईं सरकारी बसें: प्रशासन की आपराधिक लापरवाही
इस दुर्दशा के बीच सबसे शर्मनाक पहलू जिला प्रशासन की वह घोर लापरवाही है, जिसने शहर की पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का गला घोंट दिया। ऐसा नहीं है कि जमशेदपुर को बसें नहीं मिलीं। केंद्र सरकार द्वारा जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना (JnNURM) के तहत कई दर्जन अत्याधुनिक बसें जिला प्रशासन को उपलब्ध कराई गई थीं। मकसद साफ था—शहर की परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करना, सड़कों से ट्रैफिक का बोझ कम करना और छात्रों व आम जनता को एक सुरक्षित, सस्ता सफर देना।
लेकिन, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए! जिला प्रशासन ने इन बसों के परिचालन की कोई सही, पारदर्शी और स्थायी व्यवस्था ही नहीं की। अधिकारियों की घोर उदासीनता और इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये बसें सड़कों पर दौड़ने के बजाय डिपो में खड़ी-खड़ी सड़ने लगीं। रखरखाव के अभाव में करोड़ों रुपये की ये सरकारी बसें समय से पहले ही ‘कबाड़’ में तब्दील हो गईं। यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि इस औद्योगिक नगरी के नीति-नियंताओं को न तो यहां की जनता की कोई फिक्र है और न ही सुबह-शाम जान जोखिम में डालकर स्कूल-कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों की। जनता के टैक्स के पैसे को इस तरह कबाड़खानों के हवाले कर देना एक प्रशासनिक अपराध से कम नहीं है।
निजी एजेंसियों की मनमानी और आम जनता की बेबसी
जमशेदपुर में आज सैकड़ों छोटे-बड़े स्कूल और कॉलेज संचालित हो रहे हैं। मगर हैरानी की बात यह है कि पूरे शहर में एक भी सरकारी या सुव्यवस्थित स्कूली बस सेवा अस्तित्व में नहीं है। पूरा का पूरा ट्रांसपोर्टेशन निजी एजेंसियों और ऑटो चालकों के सिंडिकेट के हवाले सौंप दिया गया है। ये एजेंसियां अभिभावकों की जेब पर डाका डालती हैं और सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाकर अपनी तिजोरियां भरती हैं।
मध्यमवर्गीय माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन निजी वाहनों के किराए में फूंक देते हैं। सरकारें मंत्रियों और विधायकों को खुश करने के लिए, उन्हें विदेशी दौरों की सैर कराने के लिए तो सरकारी खजाने का मुंह खोल देती हैं, लेकिन जब बात जमशेदपुर की सड़कों पर दौड़ते मासूमों के लिए ‘पब्लिक बस सेवा’ या ‘येलो स्कूल बस’ प्रोजेक्ट शुरू करने की आती है, तो खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है।
सरकार जागे और विपक्ष निभाए अपनी जिम्मेदारी
प्रशासनिक तमाचे के बाद अब आत्ममुग्धता के खोल से बाहर निकलने का समय आ गया है। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अगर वर्तमान सरकार सचमुच जनता के प्रति थोड़ी भी जवाबदेही रखती है, तो उसे तुरंत जमशेदपुर और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक सुदृढ़ और सुरक्षित पब्लिक बस सेवा तथा सरकारी स्कूली बस कॉरिडोर की शुरुआत करनी चाहिए। कबाड़ हो चुकी बसों से सबक लेते हुए इस बार एक मजबूत मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना होगा।
इसके साथ ही, राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा को भी केवल बयानों तक सीमित न रहकर इस जन-सरोकार के मुद्दे पर एक मजबूत और निर्णायक आंदोलन खड़ा करना होगा। सड़क से लेकर सदन तक जब तक बच्चों की सुरक्षा और हक की आवाज नहीं गूंजेगी, तब तक यह औद्योगिक नगरी विकास के खोखले दावों के बीच कराहती रहेगी। राजनेताओं को यह समझना होगा कि तस्वीरों में चमकते चेहरों से ज्यादा कीमती उन बच्चों की सुरक्षा है, जो कल इस देश का भविष्य बनेंगे। समय की यही मांग है कि बच्चों के सफर को सुरक्षित और सुलभ बनाया जाए, वर्ना इतिहास इन नेताओं की इस चुप्पी को कभी माफ नहीं करेगा।













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