जमशेदपुर। लौहनगरी जमशेदपुर, जिसे कभी देश के सबसे सुव्यवस्थित औद्योगिक शहरों में शुमार किया जाता था, आज धीरे-धीरे ‘सड़क हादसों के शहर’ में तब्दील होती जा रही है। सबसे त्रासद पहलू यह नहीं है कि यहां हर दूसरे दिन कोई मां अपना बेटा या कोई स्त्री अपना सुहाग खो देती है; बल्कि सबसे दुखद यह है कि व्यवस्था इन मौतों को महज़ एक ‘आंकड़ा’ और ‘समय की नियति’ मानकर आगे बढ़ जाती है। हम हादसों से सबक लेने के बजाय अगली दुर्घटना के लिए तारीखें मुकर्रर करने में व्यस्त हैं।
हाल ही में मरीन ड्राइव पर हुए भीषण सड़क हादसे ने चार हंसते-खेलते युवाओं की जिंदगी को लील लिया। इस घटना ने प्रशासन की मुस्तैदी के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। सवाल यह उठता है कि जिस खराब ट्रक से टकराकर चार जानें गईं, वह घटना के 48 घंटे बाद तक जीवन और मौत के बीच की सरहद बनकर सड़क पर क्यों खड़ा रहा? क्या पुलिस प्रशासन किसी दूसरे बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था? व्यस्तम सड़कों पर महीनों से लावारिस या खराब खड़े भारी वाहनों को हटाने की प्राथमिक जिम्मेदारी आखिर किसकी है? लेकिन यह यक्ष प्रश्न पुलिस के आला अधिकारियों से पूछेगा कौन? यहां तो हर महकमा अपनी कागज़ी खानापूर्ति में ‘व्यस्त और मस्त’ है।
खोखले दावे और रोडमैप से महरूम जिला प्रशासन
एक औद्योगिक केंद्र होने के नाते जमशेदपुर की सड़कों पर भारी वाहनों (ट्रेलरों और ट्रकों) का अत्यधिक दबाव है, इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन विकास की इस अंधी दौड़ में आम नागरिकों की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। शहर की यातायात व्यवस्था को सिस्टमेटिक रूप से नियंत्रित करने की सामूहिक जिम्मेदारी जिला प्रशासन और अरबों का टर्नओवर करने वाली कॉरपोरेट कंपनियों की है। मगर धरातल की सच्चाई यह है कि जिला प्रशासन के पास इस शहर को हादसों से बचाने के लिए कोई ठोस, दूरदर्शी और वैज्ञानिक रोडमैप है ही नहीं।
यहां की प्रशासनिक सक्रियता भी मौसम की तरह है—हादसा होते ही कुछ दिनों के लिए पुलिस की मुस्तैदी दिखती है, चेकिंग अभियान चलते हैं, और फिर कुछ दिन बीतते ही ‘वही ढाक के तीन पात’। आज तक एक ऐसा फुल-प्रूफ ट्रैफिक सिस्टम क्यों नहीं विकसित किया जा सका जो भारी वाहनों की रफ्तार पर लगाम लगा सके? जो टाटा स्टील अपने कंपनी परिसर के भीतर ‘जीरो एक्सीडेंट’ (शून्य दुर्घटना) का लक्ष्य निर्धारित करती है और उसे कड़ाई से लागू भी करती है, वही कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत उस चहारदीवारी के बाहर घुटने टेक देती है। क्या जो सुरक्षा मानक कंपनी के गेट के अंदर लागू हैं, वे बाहर रहने वाले शहर के नागरिकों के लिए सपना ही रहेंगे? दुखद यह भी है कि इस गंभीर विषय पर न तो किसी जनप्रतिनिधि की चेतना जागती है, न कॉरपोरेट घरानों को आत्मग्लानि होती है और न ही सामाजिक संगठन कोई ठोस मुकम्मल पहल कर पाते हैं। मौतों के बाद का विलाप, मशाल जुलूस, और राजनीति की रोटियां सेकना अब इस शहर का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है।
सुनसुनिया गेट: मौत के मुहाने पर खड़े नागरिक
बर्मामाइंस थाना अंतर्गत सुनसुनिया गेट के पास 16 सितंबर की रात को हुए सड़क हादसे ने एक और बेकसूर युवक (सागर गोप) की बलि ले ली। इसके बाद जनाक्रोश भड़का, बवाल हुआ, विपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री ने इस लापरवाही के लिए सीधे तौर पर टाटा स्टील को कटघरे में खड़ा किया। लेकिन इस भारी हंगामे के 10 दिन बीत जाने के बाद भी सुनसुनिया गेट की जमीनी हकीकत में रत्ती भर बदलाव नहीं आया है। व्यवस्था की आंखें अब भी बंद हैं।
सुनसुनिया ओवरब्रिज के नीचे से जेम्को, मनिफिट और गोविंदपुर के हजारों लोग रोजाना आवागमन करते हैं। इस ओवरब्रिज के आसपास रात के वक्त ऐसा घना अंधेरा पसरा रहता है, मानो यह कोई डार्क जोन हो। पर्याप्त स्ट्रीट लाइट्स न होने के कारण यह पूरी सड़क रात में एक ‘डेथ ट्रैप’ (जानलेवा रास्ता) बन जाती है। लोग मजबूरी और समय की बचत के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर यहां से गुजरते हैं। वहीं, बर्मामाइंस से साकची जाने वाले मार्ग पर भी स्ट्रीट लाइट्स का अकाल है; आम जनता को कंपनी के भीतर लगी हाईमास्क लाइट के भरोसे छोड़ दिया गया है, जिसकी रोशनी सड़क तक आते-आते धुंधली हो जाती है।
सबसे खतरनाक स्थिति सुनसुनिया (HMS) गेट की है, जहाँ से भारी-भरकम ट्रेलर बेहद अनियंत्रित और तेज गति से मुख्य सड़क पर निकलते हैं। शुरुआती दिनों में यहां कॉरपोरेट की तरफ से सुरक्षा गार्डों की तैनाती की गई थी, जो आने-जाने वाले वाहनों को लाल झंडी या इशारे से रोकते थे। मगर मुनाफाखोरी और लापरवाही की पराकाष्ठा देखिए कि उन गार्ड्स को भी हटा लिया गया। अब यहां का आम नागरिक पूरी तरह ‘भगवान भरोसे’ है।
अनुत्तरित सवाल: जवाबदेह कौन?
यह सन्नाटा और यह अंधेरा सिर्फ सड़कों पर नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और कॉरपोरेट तंत्र की संवेदनाओं पर छाया हुआ है। जब मुनाफा कमाने वाली कंपनियां और कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस दोनों मूकदर्शक बन जाएं, तो न्याय की गुहार किससे लगाई जाए?
सड़क पर बहता यह खून सिर्फ हादसों का नतीजा नहीं है, यह उस प्रशासनिक विफलता और कॉरपोरेट उदासीनता की सामूहिक ‘हत्या’ है जो समय रहते कदम उठाने से कतराती है। अब समय आ गया है कि सिर्फ जांच कमेटियों के गठन और मुआवजे के मरहम से आगे बढ़कर, बर्मामाइंस ओवरब्रिज और सुनसुनिया गेट जैसे ब्लैक स्पॉट्स पर तुरंत प्रकाश व्यवस्था दुरुस्त की जाए, 24 घंटे ट्रैफिक गार्ड्स की तैनाती हो और भारी वाहनों के लिए रूट व गति सीमा का कड़ाई से पालन कराया जाए। अन्यथा, जमशेदपुर की सड़कें इसी तरह बेकसूरों की चीखों से गूंजती रहेंगी और इतिहास हमें इस खामोश तमाशाबीन होने के लिए कभी माफ नहीं करेगा।















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