मुंबई। भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक, टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचाने के लिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया गया है। टाटा ट्रस्ट के नवनियुक्त चेयरमैन नोएल टाटा ने भारतीय रिजर्व बैंक के कड़े नियमों का पालन करने और कंपनी को अनलिस्टेड (निजी) बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक पुनर्गठन प्रस्ताव पेश किया है।
नोएल टाटा का मानना है कि इस नए पुनर्गठन फॉर्मूले के जरिए टाटा संस अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थिति को बरकरार रख सकेगी और उसे बाजार के दबाव व सार्वजनिक स्क्रूटनी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
क्या है नोएल टाटा का ‘विलय फॉर्मूला’?
टाटा संस में लगभग 66% की बहुसंख्यक हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट ने टाटा संस के बोर्ड को एक विशेष विलय प्रस्ताव सौंपा है। इस योजना के तहत टाटा ग्रुप की दो प्रमुख और गैर-सूचीबद्ध ऑपरेटिंग कंपनियों—टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का सीधे टाटा संस में विलय किया जाएगा।
इस विलय के बाद, 31 मार्च 2026 तक संयुक्त इकाई का अनुमानित ऑपरेटिंग रेवेन्यू (परिचालन राजस्व) बढ़कर लगभग 1.05 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है।
आरबीआई के नियमों से कैसे मिलेगी राहत?
दरअसल, साल 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को एक ‘अपर-लेयर’ एनबीएफसी या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया था। केंद्रीय बैंक के नियमों के मुताबिक, इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए तीन साल के भीतर यानी 30 सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य था। टाटा संस ने इससे बचने के लिए अपना पूरा कर्ज (₹21,000 करोड़ से अधिक) चुका दिया था और एनबीएफसी का दर्जा सरेंडर करने का आवेदन किया था, जिसे आरबीआई ने खारिज कर दिया।
अब इस नए पुनर्गठन के जरिए टाटा संस का मुख्य व्यवसाय बदल जाएगा। वर्तमान में यह सिर्फ एक होल्डिंग कंपनी है, लेकिन दो बड़ी ऑपरेटिंग कंपनियों के विलय के बाद इसका ऑपरेटिंग रेवेन्यू कुल आय का 50% से अधिक (लगभग 64%) हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप, तकनीकी और कानूनी रूप से टाटा संस न तो एनबीएफसी के दायरे में फिट बैठेगी और न ही कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) की शर्तों में आएगी। इस तरह कंपनी लिस्टिंग की अनिवार्य शर्त से बच सकती है।
150 साल पुराने सामाजिक मॉडल को बचाने की कवायद
नोएल टाटा ने स्पष्ट किया है कि टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग होने से समूह का 150 साल पुराना निवेश और परोपकारी सामाजिक मॉडल बुनियादी रूप से प्रभावित हो जाएगा। टाटा संस की कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज कल्याण और चैरिटी के कामों में जाता है। यदि कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट होती है, तो उसे आम शेयरधारकों और बाजार के मुनाफे के दबाव में काम करना पड़ेगा, जिससे टाटा की मूल परोपकारी भावना प्रभावित हो सकती है।
समूह को अब इस योजना को लागू करने के लिए आरबीआई से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) और टाटा संस के बोर्ड की अंतिम मंजूरी का इंतजार है। हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, ग्रुप के भीतर बोर्ड और ट्रस्ट के बीच इस योजना के कुछ पहलुओं को लेकर आंतरिक चर्चाएं भी जारी हैं।















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