धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की राजनीति इस समय एक दिलचस्प और विरोधाभासी दौर से गुजर रही है। राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक ऐसे दल के रूप में दिखाई दे रही है जिसके पास दिग्गजों की कोई कमी नहीं है। पांच-पांच पूर्व मुख्यमंत्रियों की फौज और केंद्रीय नेतृत्व का पूरा समर्थन होने के बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में जमीन पर पार्टी की पकड़ और आम लोगों का भरोसा लगातार कमजोर हुआ है। वर्ष 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मिले झटकों के बाद से पार्टी के भीतर और बाहर जो राजनीतिक शून्यता देखी गई है, उसने यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या झारखंड भाजपा खुद के ही बनाए चक्रव्यूह में फंस गई है।
किसी भी राजनीतिक दल की ताकत उसके मुद्दों की प्रासंगिकता और जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता से आंकी जाती है। झारखंड में आज भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जिन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने का प्रयास करती है, वे मुद्दे या तो समय से पहले अप्रासंगिक (गौण) हो जाते हैं या फिर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेतृत्व वाली सरकार उन पर त्वरित और ठोस कार्रवाई करके विपक्ष को मुद्दाविहीन कर देती है। राजनीतिक विश्लेषक इसे हेमंत सोरेन सरकार की एक सतर्क प्रशासनिक रणनीति के रूप में देखते हैं, जिसने भाजपा के तीखे हमलों को बार-बार कुंद किया है।
मुद्दों की इसी कमी को छिपाने के लिए, पिछले दिनों मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से एक नया नैरेटिव (माहौल) बनाने का प्रयास किया गया था। आईटी सेल और कुछ प्रचार माध्यमों द्वारा यह हवा दी गई कि राज्य में जल्द ही झामुमो और भाजपा मिलकर सरकार बनाने जा रहे हैं। लेकिन राजनीति में बिना किसी ठोस आधार के रचे गए प्रोपेगेंडा की उम्र बहुत कम होती है। यह कथित ‘गठबंधन’ का दावा न केवल पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ, बल्कि इसने भाजपा की अंदरूनी घबराहट और रणनीतिक विफलता को भी उजागर कर दिया। इस दुष्प्रचार के औंधे मुंह गिरने से झामुमो राजनीतिक रूप से पहले से कहीं अधिक मजबूत और आक्रामक होकर उभरी है, जबकि भाजपा रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है।
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने विपक्षी किलों को ढहाने की अपनी चिरपरिचित शैली के तहत झामुमो के भीतर सेंधमारी का दांव भी खेला था। सोरेन परिवार के भीतर से सीता सोरेन को पार्टी में शामिल कराना इसी रणनीति का हिस्सा था। केंद्रीय रणनीतिकारों को पूरा भरोसा था कि इस तोड़-फोड़ से झामुमो का पारंपरिक वोट बैंक दरक जाएगा। परंतु, झारखंड की जनता ने इस दलबदल को स्वीकार नहीं किया और सीता सोरेन को खुद चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि केवल चेहरों को शामिल करा लेने से जमीनी जनाधार स्थानांतरित नहीं होता।
आज झारखंड भाजपा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां नेताओं की भरमार है, लेकिन नेतृत्व का ‘अकाल’ है। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, चंपई सोरेन और मधु कोड़ा जैसे कद्दावर चेहरे मंच पर तो दिखाई देते हैं, लेकिन पूरी पार्टी में कोई एक ऐसा सर्वमान्य प्रदेश स्तरीय नेता नहीं दिख रहा जो अपने दम पर पूरी ऊर्जा के साथ कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सत्ता के शिखर तक पहुंचाने का माद्दा रखता हो। गुटबाजी और अंतर्विरोधों के इसी जाल ने पार्टी को जनता से दूर किया है।
इस कमजोर पड़ती पकड़ और सांगठनिक शिथिलता को भांपते हुए ही आखिरकार भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को बड़े पैमाने पर सर्जरी करनी पड़ी है। प्रदेश प्रभारी और प्रदेश संगठन महामंत्री का बदला जाना इस बात का स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि पुराना ढांचा कसौटी पर खरा नहीं उतरा। पूर्व संगठन मंत्री पर लगे गंभीर आरोपों और उनके हटने के बाद पार्टी के भीतर के कई धड़ों द्वारा महसूस की गई राहत यह बताती है कि अंदर सब कुछ ठीक नहीं था।
बदलाव प्रकृति का नियम है और राजनीति का भी। नए प्रदेश संगठन मंत्री और नए प्रदेश प्रभारी के कंधों पर अब इस बिखरे हुए कुनबे को समेटने और निराश कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार करने की एक बेहद जटिल जिम्मेदारी है। क्या यह नया नेतृत्व दिग्गजों के अहंकार को साधते हुए पार्टी को जन-सरोकारों से दोबारा जोड़ पाएगा? क्या भाजपा इस सांगठनिक फेरबदल के सहारे झारखंड में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगी? ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनका उत्तर तात्कालिक बयानों में नहीं, बल्कि भविष्य के गर्भ में छिपा है। तब तक के लिए, राजनीतिक पंडितों और राज्य की जनता को थोड़ा इंतजार तो करना ही होगा।
















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