मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक की सबसे महत्वपूर्ण मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय समीक्षा बैठक सोमवार( 5 अक्टूबर) से शुरू हो गई है। देश में चौतरफा बढ़ रहे महंगाई के दबाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए अप्रत्याशित उछाल के बीच हो रही यह बैठक इस बार बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। बाजार विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार केंद्रीय बैंक नीतिगत ब्याज दरों यानी रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट (0.25%) की बढ़ोतरी का कड़ा फैसला ले सकता है। अगर ऐसा होता है, तो फरवरी 2023 के बाद यह देश में पहली ब्याज दर बढ़ोतरी होगी।
क्यों बन रहे हैं ब्याज दरें बढ़ाने के समीकरण?
वर्तमान में आरबीआई की रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर स्थिर है। हालांकि, हाल के हफ्तों में मैक्रोइकोनॉमिक हालात तेजी से बदले हैं, जिसने आरबीआई को रक्षात्मक रुख छोड़ने पर मजबूर किया है। अगस्त में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई, जो आरबीआई के मध्यम अवधि के 4% के आदर्श लक्ष्य से काफी अधिक है। पश्चिम एशिया में जारी गंभीर भू-राजनीतिक तनाव के चलते वैश्विक बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है。 इससे भारत में ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने और घरेलू बाजार में व्यापक स्तर पर महंगाई फैलने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। दुनिया भर के कई प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने बढ़ती मुद्रास्फीति को थामने के लिए सख्त मौद्रिक नीतियां अपना रखी हैं, जिसका असर भारतीय मुद्रा रुपये और विदेशी पूंजी प्रवाह पर पड़ रहा है।
होम-कार लोन लेने वालों पर क्या होगा असर?
अगर आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अगुवाई वाली 6 सदस्यीय समिति 7 अक्टूबर को दरें बढ़ाने का ऐलान करती है, तो इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
रेपो रेट बढ़ते ही कमर्शियल बैंक अपने फंड की लागत बढ़ाने के लिए रेपो-लिंक्ड लेंडिंग रेट में तत्काल वृद्धि करेंगे। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वाले मौजूदा ग्राहकों की मासिक किस्त या लोन की अवधि बढ़ जाएगी। नए कर्जदारों के लिए भी लोन लेना महंगा हो जाएगा। वहीं कर्ज महंगा होने के साथ-साथ बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराने वाले जमाकर्ताओं, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों को अपनी बचत पर अधिक ब्याज दर का लाभ मिलेगा।
आगे की राह और बाजार की नजर
बोफा ग्लोबल रिसर्च जैसी प्रमुख वैश्विक संस्थाओं का अनुमान है कि मजबूत आर्थिक विकास दर को देखते हुए आरबीआई के पास महंगाई को कुचलने के लिए दरें बढ़ाने का पूरा मौका है। अब पूरे देश और वित्तीय बाजारों की नजर 7 अक्टूबर को होने वाले आधिकारिक नीतिगत ऐलान पर टिकी है।















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