JHAHIN/2014/58773

जमशेदपुर ट्रैफिक व्यवस्था 2- दुर्घटनाओं को आमंत्रण देते मुख्य सड़कों गड्ढे

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चमचमाती सड़कों से गड्ढों के सफर तक: जमशेदपुर का यह दर्द किसे दिखेगा?

धर्मेंद्र कुमार

एक दौर था जब देश के मानचित्र पर जमशेदपुर की पहचान केवल उद्योगों से नहीं, बल्कि उसकी विश्वस्तरीय नागरिक सुविधाओं, स्वच्छता और चमचमाती सड़कों से होती थी। ‘ग्रीन सिटी, क्लीन सिटी और स्टील सिटी’ के विशेषण इस शहर की साख हुआ करते थे। महानगरों से आने वाले लोग भी यहां की सुव्यवस्थित यातायात व्यवस्था और मखमली सड़कों की तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि इसी ऐतिहासिक शहर को अब ‘गड्ढों वाले शहर’ की अनचाही पहचान मिलने लगी है। शहर की मुख्य धमनियों यानी प्रमुख सड़कों पर उभरे बड़े-बड़े गड्ढे न केवल नागरिक कुप्रबंधन की गवाही दे रहे हैं, बल्कि हर दिन निर्दोष राहगीरों को हादसों का बुलावा भी दे रहे हैं।

आज से दो दशक पहले के जमशेदपुर को याद करें, तो जेहन में एक ऐसी प्रशासनिक तत्परता उभरती है जो अब ख्वाब सी लगती है। तब शहर की व्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी टाटा स्टील के एक समर्पित विभाग के पास थी, जिसे टिस्को टाउन डिविजन कहा जाता था। उस दौर में सड़कों पर हल्की सी दरार या टूट-फूट दिखने पर भी प्रबंधन केवल मरम्मत नहीं करता था, बल्कि रातों-रात पूरी सड़क को नया रूप दे दिया जाता था। सुबह जब लोग काम पर निकलते थे, तो उन्हें एक नई चमचमाती सड़क मिलती थी। यह शहर के प्रति एक औद्योगिक घराने की जिम्मेदारी और उसकी प्रतिबद्धता का स्वर्णिम काल था।

बदलाव की शुरुआत तब हुई जब कंपनी प्रबंधन ने इस टाउन डिविजन को एक अलग अनुषंगी कंपनी के रूप में पुनर्गठित कर जूस्को (JUSCO) का रूप दे दिया। किसी भी विभाग का जब कॉर्पोरेटिकरण होता है और वह एक स्वतंत्र कंपनी बनती है, तो उसके बुनियादी सिद्धांतों में ‘लोक कल्याण’ के साथ-साथ ‘मुनाफा’ भी अनिवार्य रूप से जुड़ जाता है। शुरुआती वर्षों में तो व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही, लेकिन जैसे-जैसे व्यावसायिक दबाव और मुनाफे को अधिकतम करने की कॉर्पोरेट होड़ बढ़ी, उसका सीधा असर नागरिक सुविधाओं की गुणवत्ता पर दिखने लगा। सड़कों के निर्माण और रख-रखाव में कथित तौर पर लागत कटौती और अनदेखी का नतीजा आज पूरे शहर के सामने है, जहां मुख्य सड़कें भी गड्ढों के जाल में तब्दील हो चुकी हैं।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रहरियों—यानी हमारे राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों—की रहस्यमयी खामोशी है। जनता के वोटों से चुनकर आने वाले माननीय इस गंभीर जनसमस्या पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। विपक्ष की आवाजें भी इस मुद्दे पर नदारद हैं। जनचर्चाओं में यह कड़वा सच तैरता रहता है कि इस औद्योगिक शहर में व्यवस्था और सत्ता का ऐसा गठजोड़ बन चुका है, जहां हर कोई किसी न किसी रूप में प्रबंधन की सहूलियतों और ‘मलाई’ का हिस्सा बना हुआ है। नतीजा यह है कि आम जनता की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है।

लेकिन इस राजनीतिक और कॉर्पोरेट उदासीनता की सबसे भारी कीमत किसे चुकानी पड़ रही है? इन जानलेवा गड्ढों की वजह से होने वाली दैनिक दुर्घटनाओं में किसी रसूखदार की गाड़ी का टायर भले ही पंचर होता हो, लेकिन जान तो किसी आम आदमी की ही जाती है। वह आम आदमी, जो रोज सुबह अपने परिवार की आजीविका के लिए अपनी बाइक या साइकिल लेकर घर से निकलता है और शाम को सुरक्षित लौटने की जद्दोजहद करता है। क्या देश के सबसे सुयोजित औद्योगिक शहरों में से एक के नागरिकों की नियति यही है कि वे बुनियादी हकों के लिए तरसें? समय आ गया है कि प्रबंधन अपनी व्यावसायिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ अपनी सामाजिक जवाबदेही को भी याद करे, और जनप्रतिनिधि अपनी खामोशी तोड़कर जनता के प्रति वफादार बनें, वरना विकास की यह चमक गड्ढों के अंधेरे में कहीं खो जाएगी।

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