आईविजन व्यूरो
रांची। झारखंड की सियासत में इन दिनों चुनावी सुगबुगाहट से ज्यादा सत्ताधारी गठबंधन के भीतर का असंतोष सुर्खियां बटोर रहा है। पूर्व मंत्री और कद्दावर कांग्रेस नेता योगेंद्र साव द्वारा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अपनी ही सरकार की नीतियों के खिलाफ की गई तीखी बयानबाजी ने गठबंधन की आंतरिक दरारों को उजागर कर दिया है। इस अनुशासनहीनता पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए झारखंड कांग्रेस अनुशासन समिति ने योगेंद्र साव को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा है। यह घटनाक्रम केवल एक नेता की बगावत भर नहीं है, बल्कि यह आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले गठबंधन की एकजुटता और कांग्रेस के भीतर सांगठनिक नियंत्रण की एक बड़ी अग्निपरीक्षा है।
बगावत के सुर और सत्ता का संतुलन
गठबंधन सरकारों का यह पुराना चरित्र रहा है कि चुनाव नजदीक आते ही टिकटों की दावेदारी और क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर खींचतान तेज हो जाती है। योगेंद्र साव, जिनका हजारीबाग और बड़कागांव क्षेत्र में अच्छा-खासा राजनीतिक रसूख माना जाता है, द्वारा मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सीधे सवाल उठाना राजनीतिक हलकों में एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। परंतु, जब सत्ता में साझीदार दल का ही कोई वरिष्ठ चेहरा मुख्यमंत्री पर हमलावर हो जाए, तो विपक्ष को बैठे-बिठाए सरकार की घेराबंदी का अचूक हथियार मिल जाता है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति बेहद असहज करने वाली है, क्योंकि एक तरफ उसे अपने पुराने और जनाधार वाले नेताओं को साधे रखना है, तो दूसरी तरफ गठबंधन के सबसे बड़े चेहरे (हेमंत सोरेन) की राजनीतिक साख की रक्षा भी करनी है।
सांगठनिक अनुशासन बनाम क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा
कांग्रेस आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व द्वारा त्वरित रूप से कारण बताओ नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि पार्टी इस बार ‘पार्टी लाइन’ से समझौता करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि झारखंड में भाजपा विरोधी मोर्चे को मजबूत रखने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ उसके रिश्ते मधुर और अटूट दिखने चाहिए। यदि पार्टी अपने नेताओं की ऐसी बयानबाजी पर पर्दा डालती, तो इससे झामुमो खेमे में गलत संदेश जाता और गठबंधन के भीतर अविश्वास की खाई और चौड़ी हो जाती।
हालांकि, इस नोटिस के बाद राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो गई है कि क्या तीन दिनों का यह अल्टीमेटम योगेंद्र साव के तेवरों को शांत कर पाएगा या यह बगावत की आग को और भड़काएगा? यदि साव का रुख सख्त बना रहता है, तो पार्टी को निष्कासन जैसी कड़ी कार्रवाई का विकल्प चुनना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर क्षेत्र के जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ेगा।
झारखंड की जनता वर्तमान में विकास, रोजगार और स्थानीयता से जुड़े कई गंभीर मुद्दों से जूझ रही है। ऐसे समय में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की यह अंतर्कलह जनता के भरोसे को कमजोर करती है। झारखंड कांग्रेस का यह संकट देश में गठबंधन की राजनीति के उस स्याह पक्ष को रेखांकित करता है जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अक्सर सांगठनिक अनुशासन और गठबंधन धर्म पर भारी पड़ने लगती हैं।
यह समय कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए केवल नोटिस जारी करने का नहीं, बल्कि राज्य के सभी क्षत्रपों को एक मंच पर लाकर यह याद दिलाने का है कि आगामी चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए अनुशासनहीनता के छेद वाली नाव सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होगी।












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