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सोनिया गांधी की बढ़ीं मुश्किलें, दिल्ली की विशेष अदालत ने पलटा मजिस्ट्रेट का फैसला; नए सिरे से शुरू होगी सुनवाई

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आईविजन व्यूरो

नई दिल्ली। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी 40 साल से भी पुराने एक मतदाता सूची विवाद को लेकर एक बार फिर कानूनी संकट में घिरती नजर आ रही हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यू विशेष अदालत ने उस निचली अदालत (मजिस्ट्रेट कोर्ट) के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और जांच की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था।

विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने इस मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया है, जिससे कांग्रेस खेमे में हलचल तेज हो गई है।

 क्या है पूरा मामला और क्या हैं आरोप?

यह पूरा विवाद सोनिया गांधी की भारतीय नागरिकता और उनका नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के समय से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी का आरोप है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को आधिकारिक रूप से भारत की नागरिकता हासिल की थी। याचिका में दावा किया गया है कि नागरिकता मिलने से तीन साल पहले ही यानी जनवरी 1980 की मतदाता सूची में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से उनका नाम शामिल था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि गैर-नागरिक रहते हुए मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए कथित तौर पर गलत व जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है, जिसकी पुलिस जांच होनी चाहिए। याचिका के मुताबिक, उनका नाम 1980 में जोड़ा गया, फिर 1982 में हटाया गया और 1983 में नागरिकता मिलने के बाद दोबारा शामिल किया गया।

 विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को क्यों किया निरस्त?

इससे पहले 11 सितंबर 2025 को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने विकास त्रिपाठी की इस शिकायत को खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने तब कहा था कि मतदाता सूची और नागरिकता के विषय आपराधिक अदालतों के बजाय चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आते हैं।

लेकिन अब, विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट के उस फैसले को “त्रुटिपूर्ण और अविवेकपूर्ण”  करार दिया है। विशेष अदालत ने आदेश निरस्त करने के पीछे जो मुख्य वजहें बताई गई हैं। उनमे यह है कि निचली अदालत ने नए सुरक्षा कानून BNSS की धारा 175(3) का अनुपालन नहीं किया, जिसके तहत मामले में दिल्ली पुलिस के जांच अधिकारी से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जानी जरूरी थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि मजिस्ट्रेट को यह देखना चाहिए था कि शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं, लेकिन वे नागरिकता के अधिकार क्षेत्र के मुद्दे की ओर मुड़ गए।  अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि संसदीय लोकतंत्र में मतदाता सूची की पवित्रता आम नागरिक की आस्था का विषय है। चाहे देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति हो या आम नागरिक, नियम सबके लिए समान हैं। किसी गैर-नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में आना या छेड़छाड़ होना एक गंभीर आरोप है, जिसे बिना ठोस कानूनी आधार के खारिज नहीं किया जा सकता।  

 सोनिया गांधी का पक्ष: राजनीति से प्रेरित

इस मामले पर सोनिया गांधी के वकीलों ने कोर्ट के समक्ष आरोपों का पूरी तरह खंडन किया है। कांग्रेस नेता की ओर से दाखिल संक्षिप्त जवाब में कहा गया है कि यह शिकायत पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित, तुच्छ और राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उनके मुताबिक, शिकायतकर्ता ने बिना किसी ठोस मूल दस्तावेज या सबूत के केवल मीडिया रिपोर्ट्स और पुरानी अटकलों के आधार पर यह गंभीर आरोप लगाए हैं, जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

विशेष अदालत के इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया गया है। अदालत ने सिर्फ मजिस्ट्रेट के पुराने फैसले को तकनीकी व कानूनी कमियों के कारण रद्द किया है। अब यह मामला वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया है, जहां 29 सितंबर 2026 को इस पर नए सिरे से सुनवाई शुरू होगी। कोर्ट दिल्ली पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कानून के मुताबिक नया फैसला सुनाएगा। आगामी कुछ हफ़्तों में इस मामले को लेकर सियासी सरगर्मियां और तेज होने की उम्मीद है।

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