JHAHIN/2014/58773

जमशेदपुर की ट्रैफिक व्यवस्था(7)- शहर से गायब होते फुटपाथ,सड़को पर चलने को मजबूर शहरवासी; जिम्मेवार कौन?

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धर्मेंद्र कुमार

लौहनगरी जमशेदपुर, जिसे विश्व पटल पर एक सुनियोजित औद्योगिक शहर के रूप में देखा जाता है, आज अपने ही नागरिकों के लिए एक खतरनाक भूलभुलैया बन चुका है। टाटा स्टील जैसी दिग्गज कॉरपोरेट कंपनियों की मौजूदगी और वैश्विक साख के बीच, शहर की एक कड़वी सच्चाई यह है कि यहां का आम आदमी सड़कों पर पैदल चलने के लिए भी अपनी जान हथेली पर लेकर निकलता है। एक बेहद गंभीर और विडंबनापूर्ण सवाल पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करता है: जब जनता की सुरक्षा के लिए बनी सरकारी एजेंसियां ही राजस्व की भूख में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सौदा करने लगें, तो न्याय की गुहार किससे लगाई जाए?

जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति (JNAC) द्वारा शहर के फुटपाथों की नीलामी कर गाड़ियों की पार्किंग से करोड़ों रुपये का राजस्व वसूलना न केवल अनैतिक है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का सरेआम उल्लंघन भी है, जिसमें फुटपाथों पर पैदल चलने वालों के अधिकार को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा माना गया है। यह देश ही नहीं बल्कि विश्व का शायद इकलौता ऐसा शहर है, जहां सरकारी एजेंसी द्वारा पैदल यात्रियों के लिए बने सुरक्षित फुटपाथ की नीलामी वाहनों की पार्किंग के लिए की जाती है।

आंकड़े और हकीकत: एक अनियंत्रित विस्फोट

जमशेदपुर में वाहनों की संख्या और सड़कों की क्षमता के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। यदि हम शहर की मौजूदा परिवहन स्थिति पर नजर डालें, तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में पुणे के बाद जमशेदपुर दूसरा सबसे बड़ा दोपहिया वाहनों का गढ़ है। शहर में लगभग 30,000 ऑटो रिक्शा सड़कों पर दौड़ रहे हैं।

साकची गोलचक्कर: कुप्रबंधन का जीवंत स्मारक

शहर का सबसे व्यस्त व्यापारिक केंद्र ‘साकची गोलचक्कर’ आज प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा गवाह है। गोलचक्कर के चारों तरफ ऑटो चालकों का मनमाना साम्राज्य है। तय स्टैंडों को खाली छोड़कर गाड़ियां मुख्य सड़क पर आड़ी-तिरछी खड़ी कर दी जाती हैं। इसके बाद बची-खुची कसर फुटपाथों और सड़कों के किनारों पर लगने वाले ठेले-खोमचे पूरी कर देते हैं।

सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करना अब शहरवासियों की मजबूरी और आदत दोनों बन चुका है, क्योंकि टाउन प्लानिंग में ‘डेडिकेटेड पार्किंग ज़ोन’ की कोई दूरदर्शी व्यवस्था ही नहीं की गई। विशेषकर स्कूलों की छुट्टी के समय, जब नन्हे-मुन्ने बच्चे इन अव्यवस्थित सड़कों से गुजरते हैं, तब यह पूरा इलाका एक संभावित दुर्घटना क्षेत्र में तब्दील हो जाता है।

जनप्रतिनिधियों का मौन और प्रशासन की ‘इच्छा मृत्यु‘

इस पूरे परिदृश्य में सबसे दर्दनाक पहलू हमारे जनप्रतिनिधियों और प्रशासन का रवैया है। नेताओं के लिए जनता की यह रोजमर्रा की मुसीबत कोई मुद्दा ही नहीं है; उनके बयान और वादे महज एक ‘आईवॉश’ (दिखावा) बनकर रह गए हैं।

वहीं, जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की कार्यशैली भी ‘हादसे के बाद जागने’ वाली रूटीन परिपाटी पर चलती है। जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है और कोई मासूम अपनी जान गंवाता है, तो पुलिस दो-चार दिनों के लिए विशेष अभियान चलाकर सक्रियता का नाटक करती है। जुर्माना वसूला जाता है, हेडलाइंस बनती हैं, और फिर कुछ दिनों बाद वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली स्थिति आ जाती है। प्रशासन और पुलिस ने मानों यह तय कर लिया है कि नागरिक चाहे मरें या जिएं, उनकी कार्यसंस्कृति में सुधार नहीं होगा।

करोड़ों का मुनाफा कमाने वाली कॉरपोरेट कंपनियों को इस सामाजिक अव्यवस्था से कोई सरोकार नहीं दिखता, नेता अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं में मशगूल हैं, और प्रशासन कागजी फाइलों के बोझ तले दबा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जमशेदपुर के आम आदमी की नियति सिर्फ सड़क हादसों का शिकार होना ही रह गई है?

राजस्व की आड़ में नागरिकों को मौत के मुंह में धकेलने का यह खेल अब बंद होना चाहिए। यदि JNAC और प्रशासन ने जल्द ही फुटपाथों को मुक्त कराकर एक एकीकृत पार्किंग नीति (Integrated Parking Policy) लागू नहीं की, तो यह लौहनगरी बहुत जल्द अपने ही बोझ तले दबकर दम तोड़ देगी। यह समय किसी और हादसे का इंतजार करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाकर जवाबदेही तय करने का है।

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