JHAHIN/2014/58773

किताबों के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहा पोलियो पीड़ित लेखक मृत्युंजय

Spread the love

2018 से अब तक लिख चुके हैं आठ किताबें, सड़क किनारे किताबें बेचकर करते हैं गुजारा; सरकारी मदद की आस अब भी कायम

जमशेदपुर। सरायकेला के रहने वाले मृत्युंजय पोद्दार की कहानी संघर्ष, हौसले और आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल है, जो समाज और व्यवस्था दोनों से कई सवाल पूछती है। बचपन से पोलियो से ग्रसित मृत्युंजय ने शारीरिक चुनौतियों के बावजूद अपनी जिंदगी को किताबों के जरिए एक नई दिशा देने की कोशिश की है। वर्ष 2018 से लेखन की शुरुआत करने वाले मृत्युंजय अब तक करीब आठ किताबें लिख चुके हैं।

मृत्युंजय अपनी किताबों में समाज, जिंदगी, संघर्ष और अपने आसपास की परिस्थितियों से जुड़ी विभिन्न बातों को शब्दों के जरिए सामने रखते हैं। उनका कहना है कि लेखन उनके लिए केवल शौक नहीं, बल्कि जिंदगी जीने और अपनी बात समाज तक पहुंचाने का एक माध्यम भी है।

सरायकेला से जमशेदपुर तक का सफर

मृत्युंजय के मुताबिक, वर्ष 2024 में वह सरायकेला से जमशेदपुर आए। यहां उन्होंने अपनी लिखी किताबों को सड़क किनारे बैठकर बेचना शुरू किया, ताकि किताबों की बिक्री से होने वाली आमदनी से अपना भरण-पोषण कर सकें। उनकी किताबें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हैं और अमेजन के जरिए भी इन्हें खरीदा जा सकता है।

लेकिन किताब लिखने और उसे बेचने का यह सफर उनके लिए आसान नहीं रहा। शारीरिक परेशानी के साथ आर्थिक तंगी ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ाया है।

शेल्टर होम में गुजर रही जिंदगी

वर्तमान में मृत्युंजय जमशेदपुर न्यू कोर्ट के समीप स्थित शेल्टर होम में रहकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। उनका कहना है कि कई जनप्रतिनिधियों और नेताओं से उनकी मुलाकात हुई है। विधायक और सांसद स्तर के लोगों के सामने भी उन्होंने अपनी समस्याएं रखीं, लेकिन उनकी परेशानियों का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो पाया है।

मृत्युंजय का कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत एक ऐसे सहारे की है, जिससे वह सम्मान के साथ अपनी जिंदगी गुजार सकें और अपने लेखन को आगे बढ़ा सकें।

किताबें बेचकर चलता है भरण-पोषण

मृत्युंजय बताते हैं कि उनकी आमदनी का मुख्य जरिया उनकी लिखी किताबें हैं। सड़क किनारे बैठकर किताबें बेचकर जो कुछ कमाई होती है, उसी से वह अपने रोजमर्रा के खर्च को चलाने की कोशिश करते हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उनके ऊपर कर्ज भी है और वह उसे चुकाने की कोशिश कर रहे हैं।

उनका कहना है कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, वह अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटना नहीं चाहते। वह मेहनत करके अपना कर्ज चुकाना चाहते हैं और लेखन के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।

सरकार और व्यवस्था से सवाल

मृत्युंजय की कहानी सिर्फ एक दिव्यांग लेखक की व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर पर भी सवाल खड़ा करती है। सरकार दिव्यांगों और जरूरतमंद लोगों के लिए कई योजनाएं चलाने का दावा करती है, लेकिन क्या ऐसी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है?

मृत्युंजय आज भी मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनकी मांग किसी बड़ी सुविधा की नहीं, बल्कि ऐसी मदद की है जिससे वह सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें और अपने लेखन को जारी रख सकें।

अब देखने वाली बात यह होगी कि किताबों के जरिए समाज को आईना दिखाने वाले इस लेखक की कहानी सरकार और जनप्रतिनिधियों तक कब पहुंचती है और उन्हें कब वास्तविक मदद मिलती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is Twister !!