JHAHIN/2014/58773

सामाजिक न्याय से राजनीतिक लाभ तक

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धर्मेंद्र कुमार

आजादी के सात दशक बाद भी भारतीय समाज एक अजीब अंतर्विरोध से जूझ रहा है। एक तरफ हम डिजिटल क्रांति, वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने और अंतरिक्ष में लंबी छलांग लगाने का जश्न मना रहे हैं, तो दूसरी तरफ सामाजिक धरातल पर वर्ग-संघर्ष और ऊंच-नीच की खाई आज भी जस की तस दिखाई देती है। सबसे विडंबनापूर्ण और गंभीर यक्ष प्रश्न तब खड़ा होता है, जब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) के परिवार के सदस्य भी स्वयं को ‘पिछड़ा’ कहलाने या बताने की होड़ में शामिल दिखते हैं। यह स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि किसी समाज के वास्तविक उत्थान के लिए आखिर कितना समय पर्याप्त होना चाहिए?  क्या हमारी सामाजिक प्रगति को राजनीति की अंतहीन आकांक्षाओं ने बंधक बना लिया है?

 अंतहीन सामाजिक परिवर्तन और समय सीमा का सवाल

किसी भी राष्ट्र के इतिहास में सात दशक (75 वर्ष से अधिक) का समय एक पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए कम नहीं होता। भारत ने समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण और विशेष प्रावधानों की व्यवस्था की थी। उद्देश्य था—एक समय सीमा के भीतर हाशिए पर मौजूद लोगों को मुख्यधारा में लाना।

लेकिन तथ्य बताते हैं कि यह यात्रा सामाजिक सुधार से अधिक राजनीतिक लाभ का जरिया बन गई। आंकड़ों पर नजर डालें, तो देश में आज भी विभिन्न सरकारी और शैक्षणिक स्तरों पर जातियों के पुनर्गठन और नए वर्गों को ‘पिछड़ा’ घोषित करने की मांगें उठती रहती हैं। जब विकास का पैमाना ‘अगड़ा’ बनने के बजाय ‘पिछड़ा’ बने रहने की चाहत बन जाए, तो समाज के मानसिक और ढांचागत विकास की गति स्वतः मंद हो जाती है। यह प्रवृत्ति शुद्ध रूप से राजनीति से प्रेरित है, जहां पहचान की राजनीति को विकास की राजनीति पर तरजीह दी जाती है।

 जेन-जी (Gen Z) और बदलती उम्मीदें: एक सकारात्मक किरण

इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच, भारत की युवा पीढ़ी—विशेषकर जेन-जी (Gen Z)—एक बड़ी उम्मीद जगाती है। आधुनिक शिक्षा, वैश्विक दृष्टिकोण और डिजिटल समावेशन के कारण इस पीढ़ी में जातिगत भेदभाव या ऊंच-नीच की भावना न के बराबर है। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन में भी यही दिखा—जहां ऊंच-नीच और धर्म के बीज बोने की कोशिश नाकाम रही और सभी छात्र एकजुट होकर सरकार को झुकाने में सफल रहे।

समकालीन युवा वर्ग अब जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म और क्षमता के आधार पर एक-दूसरे का मूल्यांकन करता है। नए दौर के कॉर्पोरेट और स्टार्टअप कल्चर ने भी पारंपरिक सामाजिक बंधनों को तोड़ा है। इस पीढ़ी के लिए अस्मिता का अर्थ जातिगत आरक्षण पाना नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर समान अवसर प्राप्त करना है।

युवाओं का यह दृष्टिकोण यह सिद्ध करता है कि यदि समाज को राजनीतिक चश्मे से दूर रखकर केवल आधुनिक शिक्षा और आर्थिक अवसरों से जोड़ा जाए, तो सामाजिक असमानता को तेजी से समाप्त किया जा सकता है।

राजनीतिक स्वार्थ बनाम वास्तविक विकास

राष्ट्रपति जैसे शीर्ष पद के परिवार का स्वयं को पिछड़ा बताना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत में सामाजिक दर्जे का निर्धारण अब सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ और सुरक्षा की भावना से तय होने लगा है। यदि समाज का शीर्ष नेतृत्व या संभ्रांत वर्ग भी इसी हीनभावना या लाभ की राजनीति से ग्रस्त रहेगा, तो अंतिम पायदान पर खड़े वास्तविक जरूरतमंद का विकास कभी नहीं हो पाएगा।

एक समाज के उत्थान के लिए सात दशक का समय पर्याप्त से अधिक था, बशर्ते नीतियों का उद्देश्य वोट बैंक मजबूत करना न होकर मानव संसाधन का वास्तविक विकास होता। आज समय आ गया है कि हम जाति और वर्ग के इस राजनीतिक चक्रव्यूह से बाहर निकलें। यदि हमें वास्तव में एक विकसित भारत का निर्माण करना है, तो ‘पिछड़ेपन’ के इस गौरवमयीकरण को रोकना होगा और जेन-जी की प्रगतिशील सोच को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा बनाना होगा।

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