आईविजिन व्यूरो
लोकतंत्र की आत्मा सवालों पर टिकी होती है। नागरिक और पत्रकार जब सत्ता से बिना भय के प्रश्न पूछते हैं, तभी लोकतंत्र जीवित रहता है। लेकिन वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की लगातार गिरती रैंकिंग इस बात का साफ संकेत है कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में कहीं गहरा संकट पैदा हो चुका है। जब चुनी हुई सरकारें सार्वजनिक विसंगतियों पर बात करने वाले पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों को अपना शत्रु मानने लगें, तो वह शासन की मजबूती नहीं, बल्कि उसकी घबराहट और असुरक्षा को दर्शाता है।
हालिया दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आईं घटनाएं इस गंभीर प्रवृत्ति की पुष्टि करती हैं। महाराष्ट्र में नागरिक बुनियादी ढांचों और राजनीतिक दावों पर सवाल उठाने वाले एक्टिविस्ट और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर संतोष पंडित को पुणे पुलिस द्वारा देर रात हिरासत में लिया जाना सत्ता की तीखी असहजता को उजागर करता है। जब सवाल पूछने जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आधी रात को पुलिस दरवाजे खटखटाने लगे, तो आम जनता के बीच एक खौफ का नैरेटिव सेट करने का प्रयास साफ दिखाई देता है।
यही हाल उत्तर प्रदेश का है, जहां बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी स्कूलों की बदहाली को कैमरे पर लाने वाले यूट्यूबर्स और पत्रकारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई। सरकार की सबसे बड़ी फजीहत तब होती है जब उसके कागजी दावों की पोल धरातल पर हुई रिपोर्टिंग से खुल जाती है। इस फजीहत से बचने का जो तरीका निकाला गया, वह और भी भयावह है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में सरकारी स्कूलों के भीतर किसी भी ‘थर्ड पार्टी’ (न्यूज चैनल या यूट्यूबर्स) के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। सवाल यह है कि यदि सरकार के पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है, तो स्कूलों और अस्पतालों में कैमरे के प्रवेश से इतनी चिढ़ क्यों? क्या कमियों को ठीक करने के बजाय सच दिखाने वाले आईने को ही तोड़ देना समझदारी है?
पारदर्शिता के प्रति यही बेरुखी धार्मिक और सार्वजनिक संस्थाओं में भी दिखने लगी है। हाल ही में पुनर्गठित श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जीतेंद्र मिश्रा द्वारा मीडिया कर्मियों के प्रति दिया गया यह बयान कि वे ‘उन्हें पहचान चुके हैं और दोबारा आने नहीं दिया जाएगा’, बेहद चिंताजनक है। यह रवैया स्पष्ट करता है कि सत्ता चाहे राजनीतिक हो या किसी ट्रस्ट की, वे केवल एकतरफा अनुकूल प्रचार चाहते हैं, जवाबदेही नहीं।
वर्तमान दौर में जहां मुख्यधारा का मीडिया बड़े पैमाने पर सत्ता की चाटुकारिता और छवि चमकाने में व्यस्त नजर आता है, वहीं सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकार ही आज सच दिखाने का साहस कर रहे हैं। खोजी रिपोर्टों के अनुसार, योगी सरकार द्वारा पिछले आठ वर्षों में अपनी ब्रांडिंग और विज्ञापनों पर लगभग ₹6,800 करोड़ से अधिक की सार्वजनिक धनराशि खर्च की गई। विडंबना देखिए कि जहां इतने विशाल बजट का एक बड़ा हिस्सा महज पीआर और छवि चमकाने में झोंक दिया गया, वहीं राज्य के हजारों सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए सरकार को केवल चंद सौ करोड़ आवंटित करने पड़ते हैं।
यह विचार किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस बुनियादी सिद्धांत के पक्ष में है जो कहता है कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली हर व्यवस्था पर सवाल पूछने का अधिकार जनता का है। विज्ञापन के चमकीले होर्डिंग्स से बदहाल स्कूलों की टपकती छतें और अस्पतालों की बदइंतजामी को नहीं छुपाया जा सकता। सरकारों को यह समझना होगा कि स्वतंत्र आवाजों को दबाना या उन पर प्रतिबंध लगाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। एक परिपक्व और स्वस्थ लोकतंत्र तभी बचेगा जब सत्ता अपनी आलोचनाओं को सुनने का धैर्य दिखाए और सवाल पूछने को गुनाह मानना बंद करे।

















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