धर्मेंद्र कुमार
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बुनियादी और पवित्र सिद्धांत है—’एक नागरिक, एक मत’। लेकिन भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा देश भर में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के मौजूदा दौर ने इस बुनियादी हकीकत पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषकर झारखंड के जमीनी राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरें केवल प्रशासनिक विसंगति का संकेत नहीं हैं, बल्कि यह एक सुनियोजित और गहरी लोकतांत्रिक चिंता को जन्म दे रही हैं। चुनावी प्रक्रिया का तकनीकी शुद्धिकरण स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन जब यह ‘शुद्धिकरण’ थोक भाव में वोटरों के डिलीशन का जरिया बन जाए, तो न्यायपालिका और नागरिक समाज दोनों की खामोशी पर सवाल उठना लाजिमी है।
इस पूरे विवाद का सबसे डरावना और संस्थागत चेहरा झारखंड के गोड्डा जिले के पंचरुखी और महेश्टीकरी जैसे गांवों में देखने को मिला। वहां एक राजनीतिक दल के बूथ स्तरीय एजेंट द्वारा थोक में पूर्व-भरे (pre-filled) ‘फॉर्म-7’ (मतदाता सूची से नाम हटाने का आवेदन) जमा करने का प्रयास किया गया। जब स्थानीय ग्रामीणों और सजग बूथ लेवल अफसरों (BLO) ने इसका प्रतिकार किया और कड़ी पूछताछ की, तब जाकर यह साजिश बेनकाब हुई। यह स्वीकारोक्ति सामने आई कि स्थानीय राजनीतिक रसूखदारों और पूर्व विधायकों के इशारे पर एक खास वर्ग और विपक्षी झुकाव वाले मतदाताओं के नाम काटने का संगठित प्रयास चल रहा था। झारखंड का यह विशिष्ट मामला साबित करता है कि एसआईआर की आड़ में ‘फॉर्म-7’ के प्रावधानों का दुरुपयोग अब विपक्षियों के वोट बैंक को भौगोलिक स्तर पर ध्वस्त करने के हथियार के रूप में किया जा रहा है।
झारखंड की इस आंच ने राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस “वोट चोरी” के खेल को भी व्यापक संदर्भ दे दिया है। ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के लोकतांत्रिक भूगोल में एक अभूतपूर्व विरोधाभास देखने को मिल रहा है। दिल्ली में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 47.7 लाख (लगभग 48 लाख) मतदाताओं के नाम गायब हो चुके हैं, जिससे कुल मतदाता संख्या 1.45 करोड़ से घटकर महज 97.5 लाख रह गई है। वहीं, महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 2 करोड़ को पार कर चुका है। यह तथ्य अपने आप में विस्मयकारी है कि एक तरफ देश की जनसंख्या और युवा मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ मतदाता सूची का ग्राफ इतनी तेजी से नीचे कैसे गिर सकता है? क्या इस तकनीकी घटाव के पीछे कोई राजनीतिक गणित काम कर रहा है?
इस विवाद को हवा तब और मिली जब हाई-प्रोफाइल हस्तियों और जनप्रतिनिधियों के नाम भी इस रडार में आ गए। पंजाब के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का नाम मोहाली के ड्राफ्ट रोल से ‘परमानेंटली शिफ्टेड’ (स्थायी रूप से स्थानांतरित) बताकर हटा दिया गया। यदि देश की सर्वोच्च संसद के एक सदस्य का नाम बिना किसी पुख्ता व्यक्तिगत सत्यापन के गायब हो सकता है, तो झारखंड के सुदूर ग्रामीण अंचलों, आदिवासियों और विस्थापितों के मताधिकार सुरक्षा की क्या गारंटी है?
विपक्ष द्वारा मोदी सरकार पर लगाया जा रहा ‘वोट चोरी’ और ‘पसंदीदा जनता चुनने’ का आरोप पहली नजर में भले ही राजनीतिक लगे, लेकिन गोड्डा जैसी जमीनी हकीकत इसके निहितार्थों को बल देती है। लोकतंत्र की स्थापित परिभाषा यह है कि जनता अपनी मर्जी से सरकार चुनती है। लेकिन यदि सरकार और उसकी मशीनरी ही यह तय करने लगे कि कौन वोट देने के योग्य है और कौन नहीं, तो यह व्यवस्था ‘जनता का शासन’ न रहकर ‘शासक की जनता’ में तब्दील हो जाएगी। ऐसे नाजुक मोड़ पर देश की न्यायपालिका की मूकदर्शिता सबसे अधिक अखरती है। जब नागरिकों के सबसे मौलिक अधिकार पर संकट मंडरा रहा हो, तब अदालतों को स्वतः संज्ञान लेकर निर्वाचन आयोग की इस ‘डिलिशन नीति’ की समीक्षा करनी चाहिए। यह खेल सिर्फ किसी एक दल या नेता का नहीं है। आज अगर गोड्डा या दिल्ली में किसी और का नाम कटा है, तो कल आपकी भी बारी आ सकती है। चुनाव आयोग को तुरंत पारदर्शी कदम उठाते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी वैध नागरिक का नाम उसकी जानकारी और भौतिक सत्यापन के बिना न काटा जाए, अन्यथा यह ‘डिजिटल शुद्धिकरण’ भारतीय लोकतंत्र की असमय हत्या का कारण बन जाएगा।

















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