धर्मेंद्र कुमार
नई दिल्ली के ‘भारत मंडपम’ में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं। करीब 7 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद चीनी राष्ट्रपति की यह पहली भारत यात्रा थी, जिसने दोनों देशों के बीच वर्ष 2020 के गलवान गतिरोध के बाद जमी बर्फ को पिघलाने में बड़ी भूमिका निभाई है। लगभग 45 मिनट तक चली इस गहन बैठक में, दोनों नेताओं ने राजनयिक और आर्थिक संबंधों में हो रही ‘स्थिर प्रगति’ का स्वागत किया। इस ऐतिहासिक मुलाकात के दूरगामी परिणाम सामने आए हैं।
भारत का अडिग रुख और ‘थ्री म्यूचुअल‘ का फॉर्मूला
वार्ता के दौरान भारत ने बिना किसी कूटनीतिक हिचकिचाहट के अपना रुख साफ कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के सामने बेहद मजबूती से रेखांकित किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पूर्ण शांति और स्थिरता बनाए रखना ही दोनों देशों के व्यापक संबंधों का ‘अनिवार्य आधार’ है।
भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा विवाद को अलग रखकर व्यापार को सामान्य नहीं किया जा सकता। पीएम मोदी ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए चीन को तीन ‘म्युचुअल्स’ का मंत्र दिया- परस्पर सम्मान, परस्पर संवेदनशीलता, और परस्पर हित। इसके परिणामस्वरूप दोनों पक्ष सीमा पर मौजूदा समझौतों का कड़ाई से पालन करने और कूटनीतिक स्तर पर सैन्य गतिरोध को पूरी तरह समाप्त करने के लिए निरंतर बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए हैं।
व्यापार घाटे और सप्लाई चेन की समस्याओं पर सीधी बात
भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध बेहद गहरे हैं, लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता भारी ‘व्यापार असंतुलन’ रहा है। इस बैठक में भारत ने चीन के समक्ष इस आर्थिक चिंता को प्रमुखता से उठाया।
भारत ने चीनी बाजारों में भारतीय फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयों), आईटी सेवाओं और कृषि उत्पादों के लिए अधिक सुलभ और पारदर्शी बाजार पहुंच की मांग की। दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) की स्थिरता को बनाए रखने और व्यापारिक बाधाओं को दूर करने पर सहमति जताई। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी माना कि दोनों देश एक-दूसरे की ताकतों से सीखकर साझा विकास के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन
गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें और वीजा प्रक्रियाओं को काफी सीमित कर दिया गया था। इस वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, बिजनेस लिंकेज, सीधी उड़ानों की बहाली और वीजा नियमों को सरल बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने का निर्णय लिया गया है। हाल ही में संपन्न हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा के सफल आयोजन को भी इस दिशा में एक बड़ी प्रगति के रूप में देखा गया।
कूटनीतिक और वैश्विक मोर्चे पर भारत की जीत
इस समिट के दौरान भारत की कूटनीति का लोहा चीन को भी मानना पड़ा। चीन ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का खुलकर समर्थन किया और नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से पारित कराने में सहयोग दिया। इसके अतिरिक्त, सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चीन ने 2026 के इस मंच से कूटनीतिक रूप से यह संदेश स्वीकार किया कि भारत केवल पश्चिमी देशों के पाले में खड़ा देश नहीं है, बल्कि वह ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) का एक मजबूत और स्वतंत्र नेतृत्व करता है, जिससे वैश्विक मंचों पर भारत का कद और ऊंचा हुआ है।
यह मुलाकात किसी तात्कालिक चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि दोनों देशों के संबंधों में एक ‘सतर्क सुधार’ (Cautious Reset) के रूप में देखी जा रही है। भारत इस वार्ता से यह हासिल करने में सफल रहा कि उसने चीन को एक बहुध्रुवीय व्यवस्था के तहत बातचीत की मेज पर लाकर खड़ा किया, जहाँ सीमा की संप्रभुता सर्वोपरि है। यदि चीन एलएसी पर शांति बनाए रखने के वादे पर अडिग रहता है, तो आने वाले समय में दोनों देशों के बीच आर्थिक निवेश और राजनयिक संबंधों में एक नया और स्थिर दौर देखने को मिल सकता है।

















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