JHAHIN/2014/58773

झारखंड ब्यूरोक्रेसी में दागी चेहरों की वापसी और सुलगते नैतिक सवाल

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धर्मेंद्र कुमार

  

 भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को देश की ‘स्टील फ्रेम’ कहा जाता है, जिसका मुख्य काम देश के नीति-निर्माण और शासन में पारदर्शिता व शुचिता को बनाए रखना है। लेकिन जब इस स्टील फ्रेम में जंग लगने लगे और देश के सबसे संवेदनशील व खनिज संपदा से समृद्ध राज्य झारखंड में दागी और जेल की हवा खा चुके वरिष्ठ अधिकारियों की सेवा में वापसी की बाढ़ आ जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का तकनीकी हिस्सा नहीं रह जाता। हाल ही में झारखंड कैडर के 1999 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे का निलंबन रद्द होने और कार्मिक विभाग में उनके योगदान देने की घटना ने एक बार फिर कार्यपालिका की नैतिक विश्वसनीयता, अदालती राहत और शासन व्यवस्था के बीच चल रहे इस अजीब द्वंद्व को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।

यह कोई इकलौता या पहला मामला नहीं है। झारखंड गठन के बाद से लेकर अब तक कम से कम 7 से अधिक सेवारत आईएएस अधिकारी भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में जेल जा चुके हैं, जो देश के किसी भी राज्य की तुलना में एक भयावह रिकॉर्ड है। यदि हालिया इतिहास पर नजर डालें, तो मनरेगा घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के संगीन आरोपों में करीब दो साल से अधिक समय तक जेल में रहीं 2000 बैच की आईएएस पूजा सिंघल का निलंबन भी दिसंबर 2024 में जमानत मिलने के बाद सरकार द्वारा वापस ले लिया गया था। इसी तरह रांची लैंड स्कैम (जमीन घोटाला) में गिरफ्तार हुए 2011 बैच के आईएएस छवि रंजन को भी सुप्रीम कोर्ट से नियमित जमानत मिलने के बाद राज्य सरकार ने सेवा में बहाल कर दिया।

दोषमुक्ति’ बनाम ‘जमानत’: कानूनी बारीकियों की आड़ में प्रशासनिक पुनर्वास

प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इन अधिकारियों की वापसी को अकसर ‘प्राकृतिक न्याय’  और तकनीकी दोषमुक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि चूंकि अदालत ने उन्हें बरी नहीं किया है बल्कि सिर्फ सशर्त जमानत दी है, और जब तक वे अंतिम रूप से दोषी साबित नहीं हो जाते, तब तक सेवा नियमों के तहत निलंबन समीक्षा समिति की सिफारिशों पर उनका बहाली का हक बनता है।

लेकिन, यह दलील केवल कानूनी लफ्फाजी मात्र है। केंद्रीय सिविल सेवा नियमावली के तहत भले ही किसी अधिकारी को लंबे समय तक बिना चार्जशीट दाखिल हुए या केवल जमानत मिलने पर निलंबित रखना प्रशासनिक रूप से जटिल हो, लेकिन ‘दागियों’ को सचिवालय के महत्वपूर्ण विभागों में पुनः स्थापित करना जनता के बीच एक बेहद खतरनाक संदेश देता है। जब एक आम नागरिक देखता है कि करोड़ों के घोटालों, ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) के छापों के बाद जेल जाने वाले अधिकारी महज कुछ महीनों बाद फिर से उसी रसूख, गाड़ी और बंगले के साथ सत्ता की मलाई चख रहे हैं, तो तंत्र से उसका विश्वास पूरी तरह उठ जाता है।

राजनीतिक संरक्षण और नौकरशाही का खतरनाक गठजोड़

झारखंड में अधिकारियों की इस प्रकार की वापसी का एक प्रमुख कारण नौकरशाही का तीव्र राजनीतिकरण है। केंद्रीय जांच एजेंसियां जब कार्रवाई करती हैं, तो उसे सत्ता पक्ष ‘चुनावी एजेंडा’ या ‘प्रतिशोध की राजनीति’ करार देता है, जबकि विपक्ष इसे ‘भ्रष्टाचार का सबूत’ मानता है। जब यही दागी अधिकारी जेल से बाहर आते हैं, तो सरकारें बिना किसी आंतरिक नैतिक हिचक के उनका निलंबन समाप्त कर देती हैं, क्योंकि कई मामलों में ये अधिकारी उन नीतिगत फैसलों के ‘राजदार’ होते हैं जिनके तार सीधे राजनीतिक आकाओं से जुड़े होते हैं।

समय आ गया है कि ऑल इंडिया सर्विसेज रूल्स में एक कड़ा संशोधन किया जाए, जिसके तहत यदि किसी लोक सेवक के परिसरों से करोड़ों की नकदी या बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज़ केंद्रीय एजेंसियों द्वारा ज़ब्त किए जाते हैं, तो उनका निलंबन केवल जमानत मिलने पर स्वतः समाप्त न हो, बल्कि जब तक वे विभागीय जांच और अदालत से पूरी तरह ‘ससम्मान बरी’ नहीं हो जाते, तब तक उन्हें सचिवालय और महत्वपूर्ण सरकारी दायित्वों से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। यदि भारत को अपनी विकास यात्रा को पारदर्शी बनाना है, तो झारखंड की इस ‘दागी और बहाल’ नौकरशाही की संस्कृति पर तुरंत कड़ा कानूनी प्रहार करना होगा, अन्यथा यह जंग लगी स्टील फ्रेम लोकतंत्र की छत को कभी भी ढहा सकती है।

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