JHAHIN/2014/58773

‘माननीय’ की मर्यादा, व्यवस्था का सम्मान और जवाबदेही का सवाल

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धर्मेंद्र कुमार

झारखंड की राजनीति में डुमरी विधायक जयराम महतो और सूबे के पुलिस एसोसिएशन के बीच उपजा अभूतपूर्व विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। धनबाद के बरवाअड्डा थाना प्रभारी के साथ कथित तौर पर फोन पर हुई अभद्रता, अमर्यादित भाषा के प्रयोग और थाने में सामान तितर-बितर करने के संगीन आरोपों के बाद पुलिस एसोसिएशन ने विधायक के खिलाफ सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया है। हालांकि विधायक का दावा है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था से है। इसके बावजूद, लोकतांत्रिक ढांचे में इस तरह की तनातनी ने एक बेहद गंभीर और विचारणीय सवाल खड़ा कर दिया है। क्या जनता द्वारा चुने गए माननीयों को मर्यादा और संवैधानिक सीमाओं का पालन नहीं करना चाहिए?

संवैधानिक व्यवस्था का शीर्ष हिस्सा होकर, उसी व्यवस्था के कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाना किसी भी जनप्रतिनिधि को शोभा नहीं देता। लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका दो ऐसे पहिए हैं जो आपसी समन्वय और परस्पर सम्मान से ही सुशासन की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं  यदि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई माननीय ही कानून लागू करने वाली एजेंसी के अधिकारियों के साथ बदसलूकी और धमकी की राजनीति पर उतर आए, तो यह प्रशासनिक अराजकता की शुरुआत का संकेत है। किसी भी निर्वाचित सदस्य को उदंड होने या स्वयं को कानून से ऊपर समझने की खुली छूट कतई नहीं दी जा सकती। नियम और प्रक्रियाएं सबके लिए समान हैं, चाहे वह एक आम नागरिक हो या कोई खास जनप्रतिनिधि।

यह पूरा प्रकरण केवल इस बात पर बहस तक सीमित नहीं है कि कौन कितना शिक्षित या मुखर है। यहां मूल सवाल संस्कारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिक आचरण का है। ऊंचे पदों पर आसीन व्यक्तियों की भाषा और व्यवहार समाज के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं। जब सार्वजनिक विमर्श में शालीनता की जगह अहंकार और अमर्यादित शैली ले लेती है, तो वह पूरी लोकतांत्रिक संस्कृति को दूषित करती है। यदि किसी अधिकारी या तंत्र में भ्रष्टाचार की शिकायत है, तो एक जनप्रतिनिधि के पास सदन से लेकर उच्च अधिकारियों तक शिकायत दर्ज कराने के कई वैधानिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं, कानून अपने हाथ में लेना कभी भी सही विकल्प नहीं हो सकता।

बदलाव की इस राजनीति के समानांतर यदि हम पड़ोसी राज्य बिहार में प्रशांत किशोर की कार्यशैली को देखें, तो यह बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि वास्तविक और रचनात्मक बदलाव कैसे लाया जा सकता है। एक साधारण विधायक या राजनेता भी, बिना किसी आक्रामकता या अमर्यादित आचरण के, व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन ला सकता है। इसके लिए केवल एक मजबूत इच्छाशक्ति और साफ नियत की आवश्यकता होती है। जब कोई जनप्रतिनिधि जमीनी स्तर पर रचनात्मक नीतियां बनाने, स्वास्थ्य-शिक्षा में सुधार लाने और लोगों के अधिकारों के लिए शालीनता से संघर्ष करने पर अपना ध्यान केंद्रित करता है, तो जनता का समर्थन स्वतः प्राप्त होता है। व्यवस्था से लड़कर उसे सुधारने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन उदंडता से नहीं, बल्कि विजन और सकारात्मक दृष्टिकोण से होता है।

झारखंड की वर्तमान परिस्थिति में शासन और प्रशासन दोनों को आत्ममंथन करने की दरकार है। जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि वे व्यवस्था को सुधारने के लिए चुने गए हैं, न कि उसे पंगु बनाने के लिए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी अपने आत्मसम्मान की रक्षा के साथ-साथ जनता के प्रति संवेदनशील और पारदर्शी होना होगा। जब तक राजनीति में आक्रामकता की जगह सकारात्मक कार्यशैली और मर्यादा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक सुशासन का सपना केवल कागजी ही रह जाएगा। वक्त आ गया है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में माननीयों के लिए आचार संहिता और नैतिक दायित्वों को कड़ाई से लागू किया जाए।

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