जाओ लहरी! ये दुनिया अब आप जैसों के लिए नहीं… !!
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के सर सुंदरलाल अस्पताल के आईसीयू से आई एक खबर ने न केवल चिकित्सा जगत को, बल्कि समूचे इंसानी समाज को झकझोर कर रख दिया है। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक, पद्मश्री से सम्मानित 85 वर्षीय कार्डियोथोरेसिक सर्जन प्रोफेसर डॉ. तपन कुमार लहरी (टी.के. लहरी) के साथ आईसीयू के भीतर मारपीट और गाली-गलौज की घटना सिर्फ एक आपराधिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक चेतना की मृत्यु का आधिकारिक दस्तावेज है। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि हम एक ऐसे क्रूर और संवेदनहीन दौर में जी रहे हैं, जहाँ सेवा, समर्पण और शुचिता का कोई मूल्य नहीं बचा है।
डॉ. टी.के. लहरी कोई सामान्य नाम नहीं हैं। वे काशी और चिकित्सा जगत के लिए उस ‘भगवान’ की तरह रहे हैं, जिन्होंने वर्ष 2003 में अपनी सेवानिवृत्त के बाद भी कभी मरीजों का हाथ नहीं छोड़ा। जिस शख्स ने आसानी से किसी भी कॉर्पोरेट अस्पताल में करोड़ों रुपये की कमाई और लग्जरी जिंदगी चुनी होती, वह व्यक्ति 22 साल तक बिना एक पैसा लिए, कड़कड़ाती धूप और भारी बारिश में भी एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में काला बैग लिए बीएचयू की गलियों में पैदल ओपीडी की तरफ बढ़ता दिखाई देता था। अपनी पेंशन का अधिकांश हिस्सा गरीबों और संस्थान को दान कर देने वाले इस संत चिकित्सक को क्या पता था कि जीवन के आखिरी पड़ाव पर, जब वे खुद उसी अस्पताल के आईसीयू में असहाय होकर अपनी सांसों की लड़ाई लड़ रहे होंगे, तो बदले में उन्हें सम्मान नहीं, बल्कि अपने ही विभाग के एक एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरविंद पांडेय द्वारा गालियां और थप्पड़ मिलेंगे।
आईसीयू के भीतर से जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जिनमें 85 साल के एक बुजुर्ग डॉक्टर का चेहरा सूजा हुआ और आंखें खून की तरह लाल दिख रही हैं, वे मानवता को शर्मसार करने वाली हैं। विडंबना देखिए, जिस गुरु ने बीएचयू के न जाने कितने ही डॉक्टरों और विभागाध्यक्षों को चिकित्सा की बारीकियां सिखाईं, आज उसी के एक शिष्य ने सहनशीलता और मर्यादा की सारी हदें पार करते हुए उन पर हाथ उठा दिया। आरोपी डॉक्टर द्वारा सफ़ाई के दौरान हुए विवाद की दलीलें दी जा रही हैं, लेकिन क्या एक असहाय, गंभीर बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ बुजुर्ग को इस तरह लहूलुहान करना किसी भी तर्क से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?
यह घटना वर्तमान समाज में तेजी से समाप्त होती जा रही सहनशीलता, गहरे सामाजिक वैमनस्य और सत्ता व पद के मद में चूर क्रूरता का साक्षात चित्रण करती है। यह सवाल सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और शासन व्यवस्था के दावों की भी पोल खोलता है। क्या इसी ‘रामराज्य’ की परिकल्पना की गई थी, जहाँ समाज के सबसे सम्मानित और जीवन रक्षक माने जाने वाले संतों की सुरक्षा उनके खुद के संस्थान के भीतर, जीवन रक्षक प्रणाली (ICU) के घेरे में भी सुनिश्चित नहीं है? जब एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पद्मश्री डॉक्टर के साथ अस्पताल के भीतर ऐसी बर्बरता हो सकती है, तो उस व्यवस्था में एक आम नागरिक की सुरक्षा और सम्मान की क्या गारंटी रह जाती है?
प्रशासनिक औपचारिकता के नाम पर विश्वविद्यालय ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन तो कर दिया है, लेकिन सवाल यह है कि कड़े प्रशासनिक दावों और त्वरित न्याय की बात करने वाली सरकार और पुलिस इस मामले में अब तक मूकदर्शक क्यों बनी हुई है? सत्ता की लोलुपता और प्रशासनिक रसूख के नशे में व्यस्त यह तंत्र कब जागेगा? यदि हम आज भी मौन रहे, तो आने वाली पीढ़ियां कभी किसी निस्वार्थ सेवा के मार्ग को नहीं चुनेंगी। वाकई, यह दुनिया अब डॉ. लहरी जैसे संतों के रहने लायक नहीं बची है।

















Leave a Reply