आईविजन व्यूरो
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर सांगठनिक नियुक्तियों को लेकर उठ रहे सवाल महज़ आंतरिक असंतोष की बानगी नहीं हैं, बल्कि यह राज्य में पार्टी के भीतर गहरे पैठ चुके नेतृत्व संकट और रणनीतिक भटकाव का भी प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। हाल ही में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान (ताजदार आलम) एक ऐसे चेहरे को सौंपी गई है, जिसका ज़मीनी सियासी वजूद बेहद कमज़ोर रहा है। हालिया नगरीय निकाय चुनाव में ताजदार आलम ने महज़ 366 वोट प्राप्त किया था और अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे। ऐसे नेता को पूरे सूबे के अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी देना, भाजपा आलाकमान की सांगठनिक ‘दिव्यदृष्टि’ और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है। यह प्रश्न लाज़मी है कि जो नेतृत्व अपने गृह क्षेत्र में 500 मतदाताओं को वैचारिक रूप से प्रभावित नहीं कर सका, वह पूरे राज्य के जटिल अल्पसंख्यक समीकरण में भाजपा के लिए चुनावी संजीवनी कैसे जुटाएगा?

झारखंड की जनसांख्यिकी और चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह निर्णय और भी आत्मघाती नज़र आता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड में अल्पसंख्यक आबादी लगभग 19 से 20 प्रतिशत है, जिसमें मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 14.53% और ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी 4.30% है। राज्य की कम से कम 25 से 30 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इन आंकड़ों के बावजूद, झारखंड में अल्पसंख्यक समुदाय का झुकाव पारंपरिक रूप से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस गठबंधन की ओर रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 और उसके बाद के चुनावी पैटर्नों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और हालिया जनसांख्यिकीय बदलावों (डेमोग्राफी चेंज) को लेकर चल रही बहसों के बीच अल्पसंख्यक मतदाताओं का भाजपा के प्रति संशय और बढ़ा है। ऐसे नाज़ुक मोड़ पर भाजपा को एक ऐसे कद्दावर और सर्वमान्य अल्पसंख्यक चेहरे की दरकार थी जो इस अविश्वास की दीवार को ढहा सके, न कि एक ऐसे नेतृत्व की जो सांगठनिक सुस्ती को छुपाने के लिए हड़बड़ी में थोपा गया प्रतीत हो।
पार्टी के इस फैसले ने राज्य के भीतर सक्रिय और जनाधार वाले अल्पसंख्यक नेताओं के मनोबल को गहरा धक्का पहुंचाया है। आंतरिक गलियारों में सुलग रहा यह असंतोष आने वाले दिनों में चुनावी बगावत का रूप ले सकता है। रणनीतिक रूप से चूक का एक और सिरा सिखों जैसे प्रभावी अल्पसंख्यक समुदाय की अनदेखी से भी जुड़ता है। झारखंड के जमशेदपुर, रांची और धनबाद जैसे शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में सिख समुदाय की एक बड़ी आर्थिक और सामाजिक उपस्थिति है। यदि किसी जुझारू और तेजतर्रार सिख चेहरे को मोर्चा की कमान दी गई होती, तो न केवल राज्य के शहरी वोट बैंक में पैठ मजबूत होती, बल्कि इसका एक सकारात्मक सांगठनिक संदेश राष्ट्रीय स्तर पर भी जाता। लेकिन केंद्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व ने स्थानीय समीकरणों की गहराई में जाने के बजाय ‘तलाश से बचने की कवायद’ को तरजीह दी।
भाजपा एक कैडर-बेस्ड और चुनावी नफे-नुकसान को बारीकी से समझने वाली राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन झारखंड के संदर्भ में उसका यह प्रयोग आत्ममुग्धता का शिकार दिखता है। ज़मानत गंवा चुके सिपहसालार के भरोसे अल्पसंख्यकों के गढ़ में सेंध लगाने की यह कवायद सियासी रूप से अव्यवहारिक है। यह निर्णय साफ करता है कि भाजपा ने इस मोर्चे पर बिना सोचे-विचारे औपचारिकता पूरी कर ली है। अब यह देखना दिलचस्प लेकिन चुनौतीपूर्ण होगा कि ‘366 वोटों’ के जनाधार वाले नए सिपहसालार झारखंड की राजनीतिक बिसात पर भाजपा को सांगठनिक लाभ पहुँचाते हैं या फिर पार्टी की इस बची-खुची पकड़ को भी गर्त में ले जाते हैं। वक्त और आसन्न चुनाव के नतीजे इस सांगठनिक बदलाव का अंतिम न्याय करेंगे।
















Leave a Reply