भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हमेशा से इस बुनियादी दर्शन पर टिकी रही है कि जनता ही जनार्दन है और सरकार चुनने का अंतिम अधिकार उसी के पास है। लेकिन वर्तमान समय में केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर चलाए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) कार्यक्रम ने देश के आम नागरिकों के भीतर एक गहरा संशय और अनजाना भय पैदा कर दिया है। आज हर आम आदमी इस चिंता में डूबा है कि कहीं उसका नाम भी मतदाता सूची से न काट दिया जाए। यह स्थिति उस लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर है, जहां एक-एक वोट की कीमत सरकारें बनाने और गिराने में निर्णायक होती है।
विपक्षी दलों और कई नागरिक संगठनों द्वारा इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और इसके पीछे की मंशा पर लगातार गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन आवाजों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। आलोचकों का सबसे प्रमुख तर्क यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नियमों में किए जा रहे बदलाव और तकनीकी जटिलताओं के कारण आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग पर केंद्र की सत्ताधारी दल (भाजपा) के अनुकूल माहौल बनाने का दबाव है। ऑनलाइन ‘फॉर्म 6’ (नए वोटर पंजीकरण) की व्यवस्था में बदलावों और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की तकनीकी भूमिका पर उठाए जा रहे सवाल इस संदेह को और गहरा करते हैं। विपक्ष का दावा है कि 13.37 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जो एक अभूतपूर्व और चिंताजनक आंकड़ा है।
इस विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल उन करोड़ों मतदाताओं के भविष्य को लेकर है, जिनके नाम इस शुद्धि अभियान के दौरान सूची से हटाए जा रहे हैं। आलोचक पूछते हैं कि यदि 13.37 करोड़ मतदाताओं को वर्तमान में अयोग्य ठहराया जा रहा है, तो हालिया संपन्न हुए 2024 के लोकसभा चुनावों की वैधता पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या यह प्रक्रिया केवल वास्तविक विसंगतियों को दूर करने के लिए है या इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? इन सवालों के बीच न्यायपालिका की ओर से किसी बड़े हस्तक्षेप का न होना भी चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां आम जनता को यह उम्मीद रहती है कि अदालतें उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतः संज्ञान लेंगी। इसके विरोध में विपक्षी गठबंधन द्वारा 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक देशव्यापी ‘लोकतंत्र बचाओ मार्च’ शुरू करने की घोषणा भी इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है।
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं और समर्थकों का स्पष्ट मत है कि एक स्वच्छ, पारदर्शी और घुसपैठ या फर्जीवाड़े से मुक्त मतदाता सूची ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त और संवैधानिक संस्था है, जो बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कानून सम्मत तरीके से अपना काम कर रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार, विपक्ष अपनी संभावित चुनावी हार की जमीन तैयार करने के लिए अभी से संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर कीचड़ उछाल रहा है और जनता के बीच बेवजह डर का माहौल पैदा कर रहा है।
लोकतंत्र की गरिमा इसी में निहित है कि एक भी वैध मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न होने पाए। चुनाव आयोग का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह इस शुद्धि कार्यक्रम को लेकर उठ रहे सभी वाजिब सवालों का ठोस और पारदर्शी जवाब सार्वजनिक करे, ताकि आम जनता का भरोसा इस पूरी प्रक्रिया पर बनी रहे। आने वाले चुनाव इस बात का फैसला करेंगे कि देश की जनता इस प्रशासनिक कवायद को किस रूप में देखती है और क्या राजनीतिक दलों के डैमेज कंट्रोल और विरोध प्रदर्शनों का भविष्य की राजनीति पर कोई गहरा असर पड़ता है।
















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