नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 27 अक्टूबर होने वाली अहम सुनवाई को दिवाली के बाद तक के लिए टाल दिया है। देश की शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग द्वारा दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे पर अपना प्रत्युत्तर देने के लिए 10 दिनों का समय दिया है। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।
यह सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई। राहुल गांधी समेत विपक्ष के 13 नेताओं ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने के बाद यह रिट याचिका दायर की थी, जिसमें देशव्यापी एसआईआर को अवैध घोषित करने, पुरानी वोटर लिस्ट बहाल करने, डेटा ऑडिट कराने और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने जैसी मांगें की गई हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट में क्या हुआ?
आज कोर्ट की कार्यवाही शुरू होते ही याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने पीठ को बताया कि चुनाव आयोग का विस्तृत हलफनामा बीती रात ही मिला है। लगभग 250 पन्नों के इस लंबे दस्तावेज का अध्ययन करने और उसका कानूनी जवाब (रिज्वाइंडर) तैयार करने के लिए उन्होंने अदालत से 10 दिनों की मोहलत मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए सुनवाई स्थगित कर दी।
इसके साथ ही, अदालत ने राज्यसभा सांसद डोला सेन द्वारा दायर एक नई ताजा याचिका पर भी चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिहार में एसआईआर के दौरान अदालती मंजूरी के बिना ही ‘फॉर्म 6′ (नया वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म) में कई नियम बदल दिए गए।
चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या दलील दी?
सुनवाई से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर कर विपक्षी दलों के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। आयोग की मुख्य दलील हैं कि विपक्ष का यह आरोप गलत है कि निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए। एसआईआर से जुड़े सभी नीतिगत फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति और सर्वसम्मति से तय किए गए हैं। आयोग ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में कोई वैधानिक बदलाव या संशोधन नहीं किया गया है, बल्कि केवल लॉजिकल विसंगतियों को दूर करने के लिए ‘मैपिंग‘ की अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। ईसीआई का कहना है कि कांग्रेस और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप केवल समाचार पत्रों की कतरनों और अपूर्ण जानकारियों पर आधारित हैं, जिनका कोई पुख्ता कानूनी आधार नहीं है। आयोग ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर काम करने से रोकना या हटाना कानून के खिलाफ होगा। उन्हें केवल उसी महाभियोग प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट के एक जज को हटाने के लिए अपनाई जाती है।
मामले की पृष्ठभूमि क्या है?
विपक्षी दलों का आरोप है कि हाल ही में कई राज्यों में की गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर विसंगतियां हुईं, जिसके तहत कर्नाटक में ही करीब 99 लाख से अधिक वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। विपक्ष का दावा है कि ये फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा कथित रूप से एकतरफा लिए गए थे। अब इस पूरे मामले की कानूनी वैधता की गहराई से जांच 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाएगी।















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