झाड़ग्राम (अशोक भद्र )। झाड़ग्राम जिले के बिनपुर प्रखंड अंतर्गत हाड़दा गांव में लक्ष्मी पूजा के मौके पर लगने वाला जलेबी मेला अपनी खास मिठास और अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां जलेबी का स्वाद चखने के लिए झाड़ग्राम के अलावा बांकूड़ा, पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर तथा पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मेले में भारी मांग को देखते हुए आम लोगों के स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग ने जलेबी की गुणवत्ता की जांच की। जांच में जलेबी की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पाई गई। हालांकि, विभागीय अधिकारियों ने दुकानदारों को उत्पादन केंद्रों में कुछ जरूरी बदलाव करने के निर्देश दिए हैं।
हाड़दा का यह मेला अपनी विशिष्ट जलेबी के लिए जाना जाता है। यहां सामान्य जलेबी से अलग पारंपरिक विधि से जलेबी तैयार की जाती है। उड़द दाल एवं अरवा चावल का आटा मिलाकर बनाई जाने वाली इस जलेबी का स्वाद अलग होता है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इसे घर में करीब एक महीने तक रखकर भी खाया जा सकता है।
नीलामी से मिलती है जलेबी की दुकान
मेले में कई तरह की दुकानें लगती हैं, लेकिन जलेबी की दुकान की व्यवस्था खास है। इसके लिए हर साल नीलामी होती है और दुकान लगाने का अधिकार साहा तथा मंडल परिवारों के सदस्यों तक सीमित है। इस वर्ष सिंटू साहा ने 3 लाख 91 हजार रुपये की बोली लगाकर दुकान का ठेका लिया है। दुकान की नीलामी की बड़ी रकम के बावजूद जलेबी की कीमत तय करने का अधिकार दुकानदार को नहीं है। लक्ष्मी पूजा समिति ही इसकी दर निर्धारित करती है।
महंगाई के कारण 10 रुपये प्रति किलो बढ़े दाम
इस वर्ष बढ़ती लागत के कारण जलेबी की कीमत में पिछले साल के मुकाबले 10 रुपये प्रति किलो की वृद्धि की गई है। इसके बावजूद इसकी कीमत बाजार में मिलने वाली सामान्य जलेबी (जिलिपी) से कम बताई जा रही है। यही वजह है कि मेले में खरीदारों की भीड़ उमड़ती है। करीब 15 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में जलेबी की बिक्री कई सौ क्विंटल तक पहुंच जाती है। स्थानीय स्तर पर इसके कारोबार का अनुमान 600 से 800 क्विंटल तक बताया जाता है।
पारिवारिक पूजा से बनी सार्वजनिक परंपरा
हाड़दा में साहा और मंडल परिवारों की पारिवारिक लक्ष्मी पूजा अब सार्वजनिक उत्सव का रूप ले चुकी है। गांव में स्थायी लक्ष्मी मंदिर भी बनाया गया है। आश्विन महीने की कोजागरी पूर्णिमा के अवसर पर शुरू होने वाला पूजा उत्सव कई दिनों तक चलता है। प्रतिपदा की सुबह पूजा संपन्न होती है। कृष्ण तृतीया को घट विसर्जन और कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इसके बाद प्रतिमा का ढांचा सुरक्षित रख दिया जाता है और अगले वर्ष उसी ढांचे पर नई प्रतिमा तैयार की जाती है।
इस आयोजन की एक और खास बात यह है कि मेले की पहचान बन चुकी जलेबी देवी लक्ष्मी और सरस्वती को भोग के रूप में अर्पित नहीं की जाती। यह पूरी तरह मेले का विशेष आकर्षण और स्थानीय परंपरा का हिस्सा है।














Leave a Reply