JHAHIN/2014/58773

बिहार की सुशासन बनाम डस्टबिन घोटाला!

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  • धर्मेंद्र कुमार

बिहार की राजनीतिक गलियारे इन दिनों एक नए विवाद से गरमाए हुए हैं। सूचना के अधिकार से प्राप्त आकड़ों ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग और नगर निकायों की खरीद प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे अब आम बोलचाल में ‘डस्टबिन घोटाला’ कहा जा सकता है। एक ऐसे राज्य में जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं खुद वेंटिलेटर पर हैं, वहां कचरा फेंकने वाले एक साधारण डिब्बे की खरीद में करोड़ों के हेरफेर के आरोप व्यवस्था की नीयत और नीति दोनों को कटघरे में खड़ा करते हैं।

इस पूरे विवाद के केंद्र में वो आंकड़े हैं जो आम जनता की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोग की गवाही देते हैं। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, बाजार में मिलने वाले जिस 75 लीटर क्षमता के साधारण डस्टबिन की वास्तविक कीमत लगभग ₹1,200 से ₹1,500 के बीच होती है, उसे सरकारी फाइलों में ₹15,490 प्रति यूनिट की अत्यधिक दर पर खरीदा दिखाया गया है। इतना ही नहीं, इस डिब्बे के अंदर इस्तेमाल होने वाली मामूली प्लास्टिक थैली (कचरा पॉलीथिन), जो बाजार में मात्र ₹5 से ₹10 में मिल जाती है, उसके लिए सरकारी खजाने से ₹95 से ₹97 प्रति पीस का भुगतान किया गया है। विपक्ष का दावा है कि विभिन्न अस्पतालों और निकायों में चुनाव से ठीक पहले की गई इस थोक खरीद के जरिए लगभग ₹300 करोड़ से ₹500 करोड़ का वित्तीय नुकसान पहुंचाया गया है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह मामला पशुपालन विभाग के ऐतिहासिक ‘चारा घोटाले’ (लगभग ₹940 करोड़) से आकार में छोटा है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक दर्द उतना ही गहरा है। वहीं दूसरी ओर  प्रशासनिक महकमा इस पर अपना रक्षा कवच तैयार कर रहा है। बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड और इस पूरे प्रकरण में शामिल सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि यह कोई आम कूड़ेदान नहीं है। यह अस्पताल के संक्रामक और रसायनों से युक्त ‘बायो-मेडिकल वेस्ट’ के निस्तारण के लिए बनी एक खास माइक्रोवेव आधारित प्रणाली का हिस्सा है। सरकार का दावा है कि उच्च तापमान सहने वाले विशेष रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक और कस्टमाइज्ड शर्तों के कारण इसकी कीमतें अधिक हैं। सवाल यह है कि सरकारी अधिकारियों का तर्क मान भी लिया जाए तब भी इस डस्टबिन की कीमत लगभग 10 गुणा अधिक तो किसी भी सूरते हाल में नहीं हो सकती है।

लेकिन अधिकारियों के इस तकनीकी स्पष्टीकरण के बाद भी जनता के मन में उठ रहे सवाल पूरी तरह जायज हैं। बड़ा सवाल यह है कि जिस प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर केवल कागजी अस्पताल चल रहे हों, वहां ऐसे अजीबो-गरीब कारनामे होना अब कोई आश्चर्य की बात क्यों नहीं लगती? बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का इससे बड़ा मर्म और मजाक क्या होगा कि जहां बहुप्रचारित ‘दरभंगा एम्स’ जैसे बड़े अस्पताल का धरातल पर अब तक कोई अता-पता नहीं है, वहां ₹1,600 करोड़ रुपये की लागत से अस्पताल का भव्य मुख्य द्वार बनकर तैयार हो जाता है। सबसे दिलचस्प और हास्यास्पद पहलू यह है कि इस चमचमाते मुख्य द्वार तक पहुंचने के लिए धरातल पर कोई सड़क ही मौजूद नहीं है।

जहां अस्पताल गायब हो, पहुंचने का रास्ता गायब हो, लेकिन करोड़ों का मुख्य द्वार सीना ताने खड़ा हो, उस तंत्र से यह उम्मीद करना कि वह ₹1,500 के डस्टबिन को ₹15,000 में नहीं खरीदेगा, खुद को धोखे में रखने जैसा है। हाल ही में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट ने भी बिहार सरकार के ₹70,877 करोड़ के खर्चों के ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ गायब होने की बात कहकर इस वित्तीय अनुशासनहीनता पर मुहर लगाई है।

मुख्यमंत्री के सुशासन के दावों की साख तभी बचेगी जब सरकार इस डस्टबिन खरीद घोटाले में शामिल दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक जनता यही मानेगी कि जिस तंत्र में अस्पताल और सड़कें गायब हो सकती हैं, वहां डस्टबिन के नाम पर करोड़ों रुपये साफ हो जाना बेहद मामूली बात है।

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