- धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की सियासत ने एक बार फिर साबित किया है कि यहां की राजनीतिक जमीन को दिल्ली के चश्मे से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। पिछले 25 दिनों से राज्य को आंदोलित करने वाले छात्र आंदोलन का पटाक्षेप जिस तरह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सूझबूझ से हुआ, उसने न केवल राज्य के युवाओं को राहत मिली है, बल्कि परदे के पीछे से इस असंतोष की आग को हवा दे रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया। छात्र आंदोलन की समाप्ति केवल एक प्रशासनिक सफलता नहीं है, बल्कि यह झामुमो-कांग्रेस गठबंधन सरकार के लिए एक बड़ा रणनीतिक ‘मास्टरस्ट्रोक‘ है, जिसने विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छीन कर उसे चारों खाने चीत कर दिया है।

लंबे समय से प्रदेश मुख्यधारा की मीडिया और बीजेपी आईटी सेल द्वारा राजनीतिक गलियारों में एक खास नैरेटिव सेट करने का असफल प्रयास किया गया। कई वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने यह दावा तक कर दिया था कि झारखंड में जल्द ही कोई बड़ा उलटफेर होने वाला है और झामुमो व भाजपा मिलकर सरकार बना सकती हैं। राजनीति में कयासों का बाजार हमेशा गर्म रहता है, लेकिन मैं शुरू से इस स्टैंड पर अडिग रहा कि ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा‘ (झामुमो) कभी भी भाजपा के साथ जाकर अपनी मूल पहचान और जनाधार को दांव पर नहीं लगाएगी। क्योंकि झामुमो कांग्रेस के साथ जितनी सहजता से सरकार चला रही है, उतना बीजेपी के साथ संभव नहीं है। आज की परिस्थितियों ने मेरे इस स्टैंड पर मुहर लगा दी है। भाजपा और झामुमो के साथ आने की कहानियां महज एक ‘पॉलिटिकल प्रोपेगैंडा‘ साबित हुईं, जिसका मकसद सत्तारूढ़ गठबंधन में अविश्वास पैदा करना था। इस विफलता ने निश्चित रूप से भाजपा को एक बड़ा ‘जोर का झटका‘ दिया है।
इस झटके का असर दिल्ली के गलियारों में भी साफ देखा जा सकता है। राज्य में पार्टी की लगातार कमजोर होती जनाधार को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं को अचानक दिल्ली तलब किया। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केंद्रीय नेतृत्व राज्य की स्थिति को लेकर गंभीर और चिंतित है। राज्य में भाजपा का घटता जनाधार और हालिया राजनीतिक मात ने शीर्ष नेतृत्व को रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। बैठक के बाद से ही प्रदेश में चर्चाओं का बाजार गर्म है और यह कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा राज्य में कुछ “बड़ा” करने की फिराक में है। सवाल यह है कि इस झटके से उबरने के लिए भाजपा के पास क्या रास्ते बचे हैं? क्या पार्टी एक बार फिर केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता या किसी नए आंतरिक असंतोष को हवा देने की कोशिश करेगी, या फिर वह जमीन पर जाकर अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने का पारंपरिक संघर्ष चुनेगी?
दूसरी ओर, इस जीत से उत्साहित हेमंत सोरेन सरकार ने अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। मॉनसून सत्र में खान एवं खनिज विधेयक में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधनों को झामुमो और कांग्रेस ने राज्य के अधिकारों पर सीधा हमला माना है। गठबंधन सरकार ने इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी देकर लड़ाई को सीधे केंद्र बनाम राज्य के पाले में डाल दिया है। खनिज प्रधान राज्य होने के नाते झारखंड के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है, और सोरेन इस मुद्दे के सहारे ‘झारखंडी अस्मिता‘ और ‘जल-जंगल-जमीन‘ की राजनीति को नए सिरे से धार दे रहे हैं।
झारखंड की वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह स्पष्ट करती है कि यहां की सरकार को केवल नैरेटिव या कयासों के सहारे अस्थिर करना आसान नहीं है। छात्र आंदोलन को शांत कर हेमंत सोरेन ने अपनी प्रशासनिक क्षमता दिखाई है, तो खनिज विधेयक पर केंद्र को घेरकर अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता। अब देखना दिलचस्प होगा कि अमित शाह के निर्देशों के बाद प्रदेश भाजपा इस नए चक्रव्यूह से कैसे निकलती है और क्या वह कोई ऐसा ‘बड़ा‘ कदम उठा पाती है जो राज्य की राजनीति की दिशा बदल दे, या फिर वह केवल कयासों के दौर में ही उलझी रहेगी।
















Leave a Reply