धर्मेंद्र कुमार
लोकतंत्र की बुनियादी पहचान केवल पांच साल में एक बार मतदान करना नहीं है, बल्कि सरकार और व्यवस्था से सवाल पूछने की आजादी का होना भी है। हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई दो घटनाओं ने देश के प्रबुद्ध नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब बुनियादी नागरिक समस्याओं को उठाना भी एक अपराध बनता जा रहा है? जयपुर के रामपुरा गांव में एक जर्जर प्राथमिक स्कूल की दुर्दशा को उजागर करने पहुंचे कॉकरोच जनता पार्टी कार्यकर्ताओं पर कथित हमला और उनकी गाड़ियों को क्षतिग्रस्त किया जाना, और इससे ठीक कुछ दिन पहले [पश्चिम बंगाल के बांकुरा में ‘स्कूल ठीक करो‘ मुहिम के तहत बुनियादी ढांचे का ऑडिट करने वाले एक छात्र के पिता की कथित तौर पर हत्या कर दिया जाना। ये दोनों घटनाएं सत्ता पक्ष की आलोचना के प्रति बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा करती हैं।
जयपुर के रामपुरा की घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की नाकामी और उस नाकामी को छिपाने के हिंसक प्रयासों को उजागर करती है। जब सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता एक ऐसे स्कूल की आवाज उठाने जाते हैं जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित है, तो उन पर वैचारिक विरोध या नैरेटिव के नाम पर हमला करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं में आलोचना सुनने का धैर्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है? यदि कोई नागरिक या दल व्यवस्था की खामियों को दिखा रहा है, तो उसका जवाब लाठी और पत्थरों से देने के बजाय स्कूल की स्थिति सुधार कर दिया जाना चाहिए था।
वहीं, बंगाल में घटी घटना तो और भी भयावह है, जहां बुनियादी शिक्षा और स्कूल की बदहाली पर सवाल उठाने के बदले एक परिवार को अपने मुखिया को खोना पड़ा। किसी भी दल की सरकार हो, यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है कि जनता की जायज मांगों को दबाने के लिए ‘लाठितंत्र‘ का सहारा लिया जाए। आम जनता ने जब भी किसी दल को पूर्ण बहुमत या सत्ता की चाबी सौंपी है, तो वह एक बेहतर भविष्य, सुरक्षित माहौल और संवाद आधारित सुशासन की उम्मीद में सौंपी है, न कि असहमति की आवाजों को कुचलने के लिए।
अब समय आ गया है कि इन घटनाओं को किसी एक राजनीतिक दल, जाति या धर्म के संकीर्ण चश्मे से परे हटकर देखा जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा किसी जाति या मजहब का विषय नहीं हैं, ये सीधे तौर पर देश के बच्चों के भविष्य से जुड़े मुद्दे हैं। यदि इन मुद्दों को उठाने वाले सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो समाज का कोई भी नागरिक प्रशासन के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पाएगा। लोकतंत्र में जब संवाद का रास्ता बंद होता है, तो अराजकता का जन्म होता है। राजनीतिक दलों को यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे अपने कार्यकर्ताओं को इस बात की खुली छूट दे रहे हैं कि वे जनहित के मुद्दों को उठाने वालों को ‘राष्ट्रविरोधी‘ या जनविरोधी बताकर उन पर हिंसक प्रहार करें? यदि भारत को एक परिपक्व लोकतंत्र बने रहना है, तो सरकारों को आलोचना को सुधार के अवसर के रूप में देखना होगा।

















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