JHAHIN/2014/58773

झारखंड में लोकतंत्र बनाम लाठितंत्र, सीएम की छवि पर लगा दाग

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धर्मेंद्र कुमार

झारखंड की समकालीन राजनीति वर्तमान में एक अत्यंत चिंताजनक दौर से गुजर रही है। झारखंड हाई कोर्ट द्वारा परीक्षा निरस्तीकरण के सरकारी फैसलों पर रोक लगाए जाने के बाद राज्य के बेरोजगार युवाओं और अभ्यर्थियों का आक्रोश एक बार फिर उबल पड़ा। छात्रों ने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने और सीएम का पुतला दहन करने का एलान कर दिया। परंतु, इस आक्रोश के जवाब में सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार की हिंसा का प्रदर्शन किया, उसने राज्य की लोकतांत्रिक साख पर गहरा आघात लगा है। रांची के ऐतिहासिक अल्बर्ट एक्का चौक, हजारीबाग और गिरिडीह जैसे विभिन्न जिलों में ‘JPSC-JSSC रिफॉर्म्स मंचके बैनर तले शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी का पुतला दहन करने का प्रयास कर रहे छात्रों के साथ सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने हिंसक मारपीट की, उनके पुतले छीन लिए और दौड़ा-दौड़ाकर पीटा यह कुकृत्य न केवल निंदनीय है, बल्कि एक स्वस्थ और प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।

भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक और विशेषकर युवाओं को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति प्रकट करने और विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। पुतला दहन करना भारतीय राजनीति में दशकों से विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण माध्यम रहा है। जब युवा और रोजगार के आकांक्षी छात्र यह महसूस करते हैं कि अदालत में सरकार द्वारा प्रभावी पैरवी न किए जाने के कारण उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है, तो वे अपनी निराशा को सड़कों पर व्यक्त करने के लिए विवश होते हैं। ऐसी संवेदनशील परिस्थिति में युवाओं की चिंताओं को सुनने और उनके घावों पर मरहम लगाने के बजाय, सत्ता के मद में चूर कार्यकर्ताओं द्वारा लाठियों और बाहुबल का सहारा लेना राज्य में लाठितंत्रके हावी होने का स्पष्ट प्रमाण है। यह अत्यंत दुखद है कि इन झड़पों में महिला प्रदर्शनकारियों को भी नहीं बख्शा गया। हालांकि आंदोलनकारी छात्रों को यह समझना होगा कि हाई कोर्ट के उस फैसले में सरकार का कोई योगदान नहीं है, क्योंकि कोर्ट ने सरकार का पक्ष सुने बगैर ही सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दिया। वहीं सरकार को 15 सितंबर तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें, तो इन हिंसक घटनाओं का सबसे गंभीर और नकारात्मक असर स्वयं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक छवि पर पड़ेगा। हेमंत सोरेन ने सदैव खुद को माटी का बेटाऔर राज्य के गरीब, आदिवासी व युवाओं का हितैषी प्रदर्शित किया है। लेकिन जब उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ता उनके ही राज्य के मूलनिवासी छात्रों के खून की होली सड़कों पर खेलेंगे, तो उनकी इस कल्याणकारी और संवेदनशील छवि पर दाग लगना तय है। जनमानस में यह संदेश जा रहा है कि सरकार अब युवाओं के जायज सवालों का तार्किक उत्तर देने में असमर्थ है और अपनी नीतिगत विफलताओं को छिपाने के लिए अपने कार्यकर्ताओं की भीड़ का उपयोग कर असहमति की आवाजों का दमन कर रही है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को कभी भी दमनकारी तंत्र के रूप में नहीं दिखना चाहिए।

झारखंड की माटी गवाह रही है कि यहां के युवाओं ने अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया है। उन्हें भय या हिंसा के बल पर चुप नहीं कराया जा सकता। यदि मुख्यमंत्री वास्तव में अपनी छवि की रक्षा करना चाहते हैं और राज्य में लोकतंत्र की गरिमा को बहाल रखना चाहते हैं, तो उन्हें इन हिंसक घटनाओं का तत्काल संज्ञान लेना होगा। हुड़दंग करने वाले कार्यकर्ताओं पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी होगी और पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देना होगा कि किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी के संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो। अंततः किसी भी लोकप्रिय सरकार की ताकत उसकी लाठियों में नहीं, बल्कि जनता और युवाओं के अटूट विश्वास में निहित होती है।

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